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विज्ञापन की भाषा-शैली : विभिन्न पक्ष (vigyapan ki bhasha shaili)

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विज्ञापन की भाषा-शैली सामान्य साहित्यिक या व्यावहारिक भाषा से भिन्न ‘प्रयोजनमूलक’ होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता को केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उसे उत्पाद की ओर आकर्षित कर क्रिया (खरीद) के लिए प्रेरित करना है। विज्ञापन लेखन में भाषाई युक्तियों का प्रयोग मनोवैज्ञानिक धरातल पर किया जाता है ताकि वे सीधे उपभोक्ता की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं से जुड़ सकें। (vigyapan ki bhasha shaili)

नीचे विज्ञापन की भाषा-शैली के विभिन्न पक्षों का एक विस्तृत अकादमिक विवेचन प्रस्तुत है:

1. सादृश्यविधान (Analogy/Imagery)

सादृश्यविधान का अर्थ है—अपरिचित या अमूर्त वस्तु को परिचित और मूर्त उदाहरणों के माध्यम से समझाना। विज्ञापनदाता उत्पाद की विशेषताओं को समझाने के लिए ऐसी वस्तुओं या स्थितियों का सहारा लेते हैं जिनसे उपभोक्ता भावनात्मक रूप से जुड़ा हो। vigyapan ki bhasha shaili

  • परिचित से अपरिचित का परिचय: इसके माध्यम से कठिन तकनीकी विशेषताओं को सरल और बोधगम्य बनाया जाता है। vigyapan ki bhasha shaili
  • भावनात्मक जुड़ाव: जैसे किसी बीमा योजना की तुलना ‘बरगद की छाँव’ से करना, जो सुरक्षा और स्थायित्व का सादृश्य प्रस्तुत करती है।
  • बिम्ब निर्माण: यह उपभोक्ता के मस्तिष्क में एक सकारात्मक चित्र (Image) बनाता है, जिससे उत्पाद के प्रति विश्वास और अपनापन बढ़ता है। vigyapan ki bhasha shaili

2. अलंकरण (Ornamentation)

विज्ञापन की भाषा को साधारण से ‘असाधारण’ बनाने के लिए अलंकारों का प्रयोग किया जाता है। यह भाषा को सुंदर और प्रभावशाली बनाता है। vigyapan ki bhasha shaili

  • उपमानों का वैभव: “चाँद सा निखार” या “मखमल जैसी कोमलता” जैसे विशेषण भाषा को अलंकृत करते हैं।
  • अतिशयोक्ति: विज्ञापनों में अक्सर वस्तु के गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है ताकि वह अद्वितीय और चमत्कारी प्रतीत हो।
  • अनुप्रास का संगीत: “ठंडा-ठंडा कूल-कूल” जैसे प्रयोगों में वर्णों की आवृत्ति कानों को प्रिय लगती है और संदेश को स्थायी बनाती है। vigyapan ki bhasha shaili

3. तुकांतता (Rhyming) (vigyapan ki bhasha shaili)

तुकांतता विज्ञापन को गेय (Singable) बनाती है। यह विशेष रूप से रेडियो और टीवी जैसे श्रव्य-दृश्य माध्यमों के लिए अत्यंत प्रभावशाली होती है। vigyapan ki bhasha shaili

  • स्मृति मूल्य: तुकबंदी वाले नारे (Slogans) लोगों के अवचेतन मन में बैठ जाते हैं और वे उन्हें अनजाने में गुनगुनाने लगते हैं।
  • लयबद्धता: “मलहम है रगड़िए, दर्द को भगाइए” या “सबकी पसंद निरमा” जैसे नारे इसी भाषाई युक्ति के सफल उदाहरण हैं।
  • ब्रांड पहचान: तुकबंदी के कारण वाक्य एक मधुर लय पैदा करते हैं जो ब्रांड की ‘रिकॉल वैल्यू’ को कई गुना बढ़ा देती है।

4. समानान्तरता (Parallelism) (vigyapan ki bhasha shaili)

समानान्तरता का अर्थ है—एक ही प्रकार की व्याकरणिक संरचना वाले दो या दो से अधिक वाक्यों या वाक्यांशों का साथ प्रयोग करना।

समानान्तरता का अर्थ है—एक ही प्रकार की व्याकरणिक संरचना वाले दो या दो से अधिक वाक्यों या वाक्यांशों का साथ प्रयोग करना।

  • संतुलन और वजन: यह संदेश में एक लयबद्ध संतुलन पैदा करता है, जिससे संदेश सुगठित लगता है।
  • प्रभावशाली प्रस्तुति: “दाम कम, काम ज़्यादा” या “नाम भी, पहचान भी” जैसे प्रयोगों में बनावट की एकरूपता संदेश को प्रभावी बनाती है।
  • तुलनात्मक स्पष्टता: इसके माध्यम से उत्पाद के दो लाभों को एक साथ समान महत्व के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है।

5. विचलन (Deviation) (vigyapan ki bhasha shaili)

विज्ञापन की भाषा अक्सर ध्यान आकर्षित करने के लिए व्याकरण के स्थापित नियमों का जानबूझकर उल्लंघन करती है, जिसे ‘भाषाई विचलन’ कहा जाता है।

  • नियम तोड़ना: पूर्ण वाक्यों के बजाय केवल प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग करना, जैसे— “Think Different”।
  • ध्यान आकर्षण: व्याकरणिक त्रुटि या असामान्य शब्द प्रयोग उपभोक्ता को चौंकाता है और उसे विज्ञापन पर रुकने के लिए मजबूर करता है। vigyapan ki bhasha shaili
  • नूतनता: नए और गढ़े हुए शब्दों का प्रयोग (जैसे ‘डर्टिशियस’) ब्रांड को एक आधुनिक और ‘कूल’ इमेज देता है।

6. मुहावरे और लोकोक्तियाँ (Idioms & Proverbs)

विज्ञापन भाषा को जड़ों से जोड़ने के लिए प्रचलित मुहावरों और लोकोक्तियों का चतुराई से उपयोग किया जाता है।

  • सांस्कृतिक जुड़ाव: मुहावरे समाज की साझा समझ का हिस्सा होते हैं, जिससे उपभोक्ता तुरंत जुड़ जाता है।
  • नया अर्थ: कभी-कभी विज्ञापनदाता पुराने मुहावरे को बदलकर नया मोड़ देते हैं, जैसे “सोने पे सुहागा” को किसी सेल या ऑफर के साथ जोड़ना।
  • लोकप्रियता: “आम के आम, गुठलियों के दाम” जैसे मुहावरे उत्पाद की उपयोगिता को लोक-प्रचलित भाषा में सिद्ध करते हैं।

7. भाषासंकर (Code-Mixing/Hybrid Language)

आधुनिक भारतीय विज्ञापन की सबसे बड़ी पहचान ‘हिंग्लिश’ (हिंदी + अंग्रेजी) का प्रयोग है, जो वैश्विक और स्थानीय का संगम है।

  • युवा आकर्षण: यह शहरी युवाओं की वास्तविक बोलचाल की भाषा है, इसलिए वे इससे सहजता से जुड़ते हैं।
  • प्रभावी नारे: “Life हो तो ऐसी” या “Ye Dil Maange More” जैसे प्रयोग इसी शैली की देन हैं।
  • सहज संवाद: इसमें तकनीकी शब्दों के लिए अंग्रेजी और भावनात्मक जुड़ाव के लिए हिंदी का संतुलन बनाया जाता है।

8. भाव-भंगिमा (Body Language)

दृश्य विज्ञापनों में भाषा केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पात्रों की शारीरिक गतिविधियाँ भी संदेश संप्रेषित करती हैं।

  • अशाब्दिक संचार: चेहरे की मुस्कान, आँखों का संपर्क और हाथों के इशारे (जैसे ‘थम्ब्स अप’) विश्वास और संतुष्टि को दर्शाते हैं।
  • भावनात्मक प्रभाव: पात्रों की भाव-भंगिमाएँ उत्पाद के उपयोग के बाद के ‘सुखद अनुभव’ को बिना शब्दों के बयां कर देती हैं। vigyapan ki bhasha shaili
  • सीधा संपर्क: कैमरे की ओर सीधे देखकर बात करना उपभोक्ता के साथ एक पारदर्शी और सीधा संबंध बनाने का कार्य करता है।

अकादमिक दृष्टि से विज्ञापन की भाषा ‘बहुआयामी’ और ‘मनोवैज्ञानिक’ है जो व्याकरण के कड़े अनुशासन के बजाय ‘लोकप्रियता’ और ‘सफल संप्रेषण’ को आधार बनाती है। उपरोक्त सभी भाषाई पक्ष मिलकर एक ऐसी प्रभावी शैली का निर्माण करते हैं जो उपभोक्ता के तर्क को गौण कर उसकी भावनाओं को झंकृत करती है और उसे खरीदारी के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है। आज के प्रतिस्पर्धी बाजार में वही विज्ञापन सफल है जो इन भाषाई युक्तियों का रचनात्मक प्रयोग करके ब्रांड को एक अद्वितीय ‘व्यक्तित्व’ प्रदान कर सके।

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