रस : स्वरूप, अवयव और भेद (रस संप्रदाय)
भारतीय काव्यशास्त्र में ‘रस’ (रस संप्रदाय) को काव्य की आत्मा माना गया है। रस का शाब्दिक अर्थ है ‘आनंद’ या ‘स्वाद’। जिस प्रकार भोजन का स्वाद जिह्वा से लिया जाता है, उसी प्रकार काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक को देखने से जिस अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है, उसे ही ‘रस’ कहा जाता है।
आचार्य विश्वनाथ ने स्पष्ट कहा है— “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” (रसयुक्त वाक्य ही काव्य है)।
1. रस का स्वरूप (Nature of Rasa) (रस संप्रदाय)
भारतीय काव्यशास्त्र में ‘रस’ का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म और आध्यात्मिक माना गया है। रस का अर्थ केवल ‘स्वाद’ नहीं, बल्कि वह अलौकिक आनंद है जो काव्य को पढ़ने या नाटक को देखने से प्राप्त होता है। आचार्यों ने रस के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ बताई हैं:
- ब्रह्मानंद सहोदर: आचार्य विश्वनाथ के अनुसार, रसानुभूति ईश्वर की प्राप्ति से मिलने वाले आनंद (ब्रह्मानंद) के समान है। यह लौकिक सुख-दुःख से ऊपर की अवस्था है। (रस संप्रदाय)
- अखंडता: रसानुभूति के समय विभाव, अनुभाव और संचारी भाव अलग-अलग प्रतीत नहीं होते, बल्कि वे मिलकर एक अखंड आनंद प्रदान करते हैं। जैसे शरबत में चीनी, नींबू और नमक मिलकर एक नया स्वाद देते हैं।
- स्वप्रकाशानंद और चिन्मय: रस स्वयं प्रकाशित होता है। यह ज्ञानस्वरूप और चेतन है, जिसमें पाठक अपनी सुध-बुध भूलकर पूरी तरह से विषय में डूब जाता है।
- लोकोत्तर चमत्कार: रस का अनुभव ‘लोकोत्तर’ (इस दुनिया से परे) माना गया है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हृदय का विस्तार है, जहाँ पाठक ‘स्व’ और ‘पर’ (मेरा-तेरा) के भेद को त्याग देता है।
- वेद्यान्तर-स्पर्श-शून्य: रस की दशा में व्यक्ति को किसी अन्य सांसारिक ज्ञान का बोध नहीं रहता। वह पूर्णतः तन्मय (मग्न) हो जाता है। (रस संप्रदाय)
संक्षेप में, रस वह अवस्था है जहाँ मनुष्य की भावनाएँ परिष्कृत होकर परमानंद में बदल जाती हैं।
विभिन्न आचार्यों के मत (रस संप्रदाय)
भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा में रस के स्वरूप को लेकर आचार्यों के विचारों में विकास मिलता है:
- भरतमुनि: इन्होंने रस को ‘आस्वाद’ माना। उनके अनुसार, जिस प्रकार अनेक मसालों के मिश्रण से व्यंजन में स्वाद आता है, वैसे ही विभिन्न भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
- आचार्य विश्वनाथ: इन्होंने रस को काव्य की ‘आत्मा’ माना (वाक्यं रसात्मकं काव्यम्)। उनके अनुसार, रस चैतन्य स्वरूप और आनंदमय है। (रस संप्रदाय)
- अभिनवगुप्त: इन्होंने रस को ‘अभिव्यक्ति’ माना। उनके अनुसार, रस हृदय में पहले से ही ‘संस्कार’ रूप में मौजूद रहता है, जो उचित विभावों के मिलने पर प्रकट हो जाता है।
- भट्टनायक: इन्होंने रस को ‘भुक्ति’ (भोग) माना और ‘साधारणीकरण’ का सिद्धांत दिया, जिससे रस व्यक्तिगत न रहकर सामूहिक आनंद बन जाता है।
- पंडितराज जगन्नाथ: इन्होंने रस को ‘रमणीयता’ से जोड़ा और इसे चित्त की वह अवस्था माना जो केवल आनंद से सराबोर होती है। (रस संप्रदाय)
2. रस के अवयव (Components of Rasa)
आचार्य भरतमुनि ने रस की निष्पत्ति के लिए चार अंगों या अवयवों को अनिवार्य माना है। इन चारों के संयोग से ही रस की उत्पत्ति होती है। (रस संप्रदाय)
(क) स्थायी भाव (Static Emotions)
वे भाव जो मनुष्य के हृदय में सुप्त अवस्था में सदैव विद्यमान रहते हैं और अनुकूल वातावरण मिलते ही जाग्रत हो जाते हैं, ‘स्थायी भाव’ कहलाते हैं। इनकी संख्या मूलतः 9 मानी गई थी, जो अब 11 तक पहुँच गई है। (रस संप्रदाय)
(ख) विभाव (Determinants)
स्थायी भावों को जाग्रत करने वाले कारण ‘विभाव’ कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं:
- आलंबन विभाव: जिसका सहारा लेकर भाव जगते हैं (जैसे नायक और नायिका)। इसके भी दो अंग हैं— आश्रय (जिसके मन में भाव जगे) और विषय (जिसे देखकर भाव जगे)। (रस संप्रदाय)
- उद्दीपन विभाव: जो जगे हुए भावों को और तीव्र (उद्दीप्त) कर देते हैं (जैसे चाँदनी रात, एकांत स्थल, कोयल का कूजना)।
(ग) अनुभाव (Consequents)
अनुभाव का अर्थ है— ‘भावों के पीछे उत्पन्न होने वाली चेष्टाएँ’। जब हृदय में स्थायी भाव जाग्रत होता है, तो आश्रय की जो शारीरिक और मानसिक क्रियाएँ प्रकट होती हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं। इसके मुख्य चार भेद हैं:
- कायिक (आंगिक): शरीर के अंगों द्वारा की गई जानबूझकर की गई चेष्टाएँ, जैसे— हाथ हिलाना, संकेत करना या भागना। (रस संप्रदाय)
- मानसिक: मन की प्रसन्नता या विषाद जो मुखमुद्रा से प्रकट हो। (रस संप्रदाय)
- आहार्य: वेशभूषा, आभूषण या बनाव-शृंगार के माध्यम से भावों को व्यक्त करना।
- सात्त्विक: वे स्वाभाविक क्रियाएँ जो बिना किसी बाह्य प्रयत्न के स्वतः (Involuntary) प्रकट होती हैं। इनकी संख्या 8 है (जैसे— स्वेद/पसीना, कम्प, अश्रु, रोमांच, स्वरभंग, स्तंभ, वैवर्ण्य और प्रलय)।
(घ) संचारी या व्यभिचारी भाव (Transitory Emotions) (रस संप्रदाय)
ये वे भाव हैं जो स्थायी भाव के साथ बीच-बीच में पानी के बुलबुले की तरह प्रकट होते हैं और लुप्त हो जाते हैं। ये स्थायी भाव को पुष्ट करने में सहायता करते हैं। इनकी संख्या 33 मानी गई है (जैसे— हर्ष, विषाद, लज्जा, ग्लानि, स्मृति आदि)।
3. रस के भेद (Kinds of Rasa)
भारतीय आचार्यों ने रसों की संख्या समय-समय पर बढ़ाई है। भरतमुनि ने 8 रस माने थे, बाद में ‘शांत’ रस को मिलाकर संख्या 9 (नवरस) हुई और अंततः वात्सल्य और भक्ति को जोड़कर यह 11 तक पहुँच गई। (रस संप्रदाय)
| रस का नाम | स्थायी भाव | संक्षिप्त परिचय |
| 1. शृंगार रस | रति (प्रेम) | इसे ‘रसराज’ कहा जाता है। इसके दो पक्ष हैं: संयोग (मिलन) और विप्रलंभ/वियोग (बिछड़ना)। |
| 2. हास्य रस | हास | विकृत वेशभूषा, वाणी या चेष्टा को देखकर उत्पन्न होने वाली प्रसन्नता। |
| 3. करुण रस | शोक | प्रिय वस्तु के नाश या अनिष्ट की प्राप्ति से उत्पन्न दुःख। |
| 4. वीर रस | उत्साह | युद्ध, दान या धर्म के लिए मन में उमड़ने वाला जोश। |
| 5. रौद्र रस | क्रोध | शत्रु या दुष्ट व्यक्ति की धृष्टता देखकर पैदा होने वाला गुस्सा। |
| 6. भयानक रस | भय | किसी डरावनी वस्तु या हिंसक जीव को देखकर उत्पन्न डर। |
| 7. वीभत्स रस | जुगुप्सा (घृणा) | घृणित वस्तुओं, मांस, रक्त आदि को देखकर उत्पन्न होने वाली ग्लानि। |
| 8. अद्भुत रस | विस्मय (आश्चर्य) | किसी अलौकिक या आश्चर्यजनक वस्तु को देखकर दाँतों तले उँगली दबाना। |
| 9. शांत रस | निर्वेद (वैराग्य) | संसार की नश्वरता और वैराग्य से उत्पन्न शांति। |
| 10. वात्सल्य रस | वत्सलता | माता-पिता का संतान के प्रति प्रेम (जैसे सूरदास का कृष्ण वर्णन)। |
| 11. भक्ति रस | भगवद-रति | ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम और अनुराग। |
रस भारतीय साहित्य शास्त्र का वह प्राण तत्व है जो साहित्य को केवल बौद्धिक व्यायाम न रखकर उसे हृदय की वस्तु बनाता है। भरतमुनि से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक सभी ने स्वीकार किया है कि यदि काव्य में रस नहीं है, तो वह निर्जीव है। रस ही वह तत्व है जो मनुष्य को संकुचित स्वार्थों से ऊपर उठाकर उसे ‘लोक-हृदय’ के साथ जोड़ देता है। (रस संप्रदाय)