काव्य प्रयोजन (Kavya Prayojan)
भारतीय काव्यशास्त्र में ‘काव्य प्रयोजन’ (Kavya Prayojan) का अर्थ है—काव्य रचना और उसके पठन से प्राप्त होने वाला फल या उद्देश्य। कोई भी कवि बिना किसी लक्ष्य के सृजन नहीं करता और कोई भी पाठक बिना किसी प्राप्ति की आकांक्षा के काव्य का रसास्वादन नहीं करता। भारतीय आचार्यों ने प्राचीन काल से ही इस विषय पर अत्यंत सूक्ष्म और सर्वांगीण विमर्श किया है।
| आचार्य | काल (लगभग) | मुख्य ग्रंथ | प्रमुख काव्य प्रयोजन | विशेष टिप्पणी / दृष्टिकोण |
| भरतमुनि | दूसरी सदी ई.पू. | नाट्यशास्त्र | धर्म, यश, आयु, बुद्धि, लोक-उपदेश, विश्रांति | दुख और परिश्रम से थके हुए लोगों को शांति (विश्रांति) देना। |
| भामह | छठी शताब्दी | काव्यालंकार | धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, कला-नैपुण्य, कीर्ति, प्रीति | पुरुषार्थ चतुष्टय और आनंद का समन्वय। |
| दण्डी | सातवीं शताब्दी | काव्यादर्श | कीर्ति (यश) और लोक-व्युत्पत्ति | काव्य को ज्ञान का प्रकाश माना जो अज्ञान को दूर करता है। |
| वामन | आठवीं शताब्दी | काव्यालंकार सूत्रवृत्ति | १. दृष्ट (प्रीति/आनंद) २. अदृष्ट (कीर्ति/यश) | प्रयोजनों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष श्रेणियों में बाँटा। |
| रुद्रट | नौवीं शताब्दी | काव्यालंकार | अनर्थ का नाश, धन, सुख, यश और पुरुषार्थ सिद्धि | विरल प्रतिभा वाले कवियों के लिए मोक्ष की प्राप्ति। |
| अभिनवगुप्त | दसवीं शताब्दी | अभिनवभारती | सद्यः परनिर्वृत्ति (आनंद) | रसानुभूति को ही मुख्य प्रयोजन माना। |
| मम्मट | ग्यारहवीं शताब्दी | काव्यप्रकाश | यश, अर्थ, व्यवहार-ज्ञान, शिवेतर-क्षति, आनंद, कान्तासम्मित उपदेश | सर्वाधिक मान्य वर्गीकरण; आनंद को ‘सकलप्रयोजनमौलिभूत’ माना। |
| विश्वनाथ | चौदहवीं शताब्दी | साहित्य दर्पण | धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष (चतुर्वर्ग फल) | माना कि काव्य कम बुद्धि वालों को भी सरलता से ज्ञान देता है। |
| जगन्नाथ | सत्रहवीं शताब्दी | रसगंगाधर | कीर्ति और गुरु-देवता की कृपा से प्राप्त आनंद | कीर्ति और आह्लाद (सुख) पर विशेष बल दिया। |
1. आचार्य भरतमुनि (नाट्यशास्त्र) (Kavya Prayojan)
काव्य प्रयोजन पर सबसे प्रथम विचार आचार्य भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में मिलता है। यद्यपि उनका ग्रंथ नाट्य पर केंद्रित है, किंतु उस समय नाटक ही काव्य का मुख्य रूप था। भरतमुनि ने काव्य (नाटक) का प्रयोजन ‘दुःखार्त’ (दुख से पीड़ित) और ‘श्रमार्त’ (परिश्रम से थके हुए) लोगों को विश्रांति (शांति और मनोरंजन) प्रदान करना माना है। (Kavya Prayojan)
- सूत्र: उन्होंने धर्म, यश, आयु, हित और बुद्धि की वृद्धि के साथ-साथ ‘लोक-उपदेश’ को भी प्रमुख प्रयोजन माना।
“दुःखार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्।
विश्रांतिजननं काले नाट्यमेतद्भविष्यति।।”
2. आचार्य भामह (काव्यालंकार) (Kavya Prayojan)
आचार्य भामह ने काव्य प्रयोजनों के दायरे को और अधिक व्यापक बनाया। उन्होंने पुरुषार्थ चतुष्टय को काव्य से जोड़ दिया।
- बहुआयामी प्रयोजन: भामह के अनुसार श्रेष्ठ काव्य के सेवन से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चारों पुरुषार्थों) की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही, यह कलाओं में निपुणता लाता है और कीर्ति (यश) व प्रीति (आनंद) प्रदान करता है।
3. आचार्य वामन (काव्यालंकार सूत्रवृत्ति) (Kavya Prayojan)
वामन ने काव्य प्रयोजनों को अत्यंत सरल और तार्किक ढंग से दो श्रेणियों में विभाजित किया है:
- दृष्ट प्रयोजन (प्रत्यक्ष): इसका संबंध ‘प्रीति’ (आनंद) से है, जो काव्य पढ़ते ही प्राप्त होता है।
- अदृष्ट प्रयोजन (अप्रत्यक्ष): इसका संबंध ‘कीर्ति’ (यश) से है। यश मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है, इसलिए इसे अदृष्ट माना गया। (Kavya Prayojan)
वामन का मानना था कि कविता का मुख्य लक्ष्य कवि को अमर करना और पाठक को आनंदित करना है।
4. आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) — सर्वमान्य एवं श्रेष्ठ मत (Kavya Prayojan)
आचार्य मम्मट का ‘काव्यप्रकाश’ में दिया गया प्रयोजन-निरूपण सबसे अधिक संतुलित, वैज्ञानिक और व्यापक माना जाता है। उन्होंने छह प्रमुख प्रयोजन बताए हैं:
“काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।।”
मम्मट के छह प्रयोजनों का विश्लेषण:
- यशसे (यश की प्राप्ति): यह कविगत प्रयोजन है। महाकवि कालिदास, तुलसी और सूर आज भी अपनी कीर्ति के कारण जीवित हैं।
- अर्थकृते (धन की प्राप्ति): काव्य रचना से धन लाभ होता है। प्राचीन काल में कवि राजाओं से पुरस्कार प्राप्त करते थे (जैसे बिहारी को प्रत्येक दोहे पर स्वर्ण मुद्रा प्राप्त होती थी)। (Kavya Prayojan)
- व्यवहारविदे (लोक-व्यवहार का ज्ञान): यह पाठकगत प्रयोजन है। काव्य हमें सिखाता है कि राजा, गुरु, मित्र या पत्नी के साथ कैसा आचरण करना चाहिए (जैसे रामायण से राम जैसा बनने की शिक्षा मिलती है)। (Kavya Prayojan)
- शिवेतरक्षतये (अमंगल का विनाश): ‘शिव’ का अर्थ है कल्याण और ‘इतर’ का अर्थ है बुरा। काव्य के प्रभाव से विपत्तियों और रोगों का नाश होता है। (उदाहरण: हनुमान बाहुक से तुलसी के बाहु-पीड़ा की निवृत्ति)। (Kavya Prayojan)
- सद्यः परनिर्वृतये (तत्काल परम आनंद): इसे मम्मट ने ‘सकलप्रयोजनमौलिभूतम्’ (सभी प्रयोजनों का मुकुट) कहा है। कविता पढ़ते ही जो रसानंद मिलता है, वह ब्रह्मानंद के समान होता है। यह काव्य का मुख्य उद्देश्य है।
- कान्तासम्मित उपदेश (मधुर उपदेश): उपदेश तीन प्रकार के होते हैं:
- प्रभु-सम्मित: वेद-पुराणों की तरह कठोर आज्ञा। (Kavya Prayojan)
- सुहृद-सम्मित: मित्र की तरह सलाह। (Kavya Prayojan)
कान्ता-सम्मित: पत्नी की तरह प्रेमपूर्वक और मधुर ढंग से सही मार्ग पर ले जाना। काव्य यही कार्य करता है।
5. आचार्य विश्वनाथ एवं अन्य परवर्ती आचार्य (Kavya Prayojan)
- आचार्य विश्वनाथ: ‘साहित्य दर्पण’ में इन्होंने मम्मट के विचारों का समर्थन करते हुए चतुर्वर्ग फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति को ही मुख्य प्रयोजन माना। उनका तर्क था कि अल्प बुद्धि वाले लोग (जैसे राजकुमार) भी काव्य के माध्यम से इन कठिन लक्ष्यों को सरलता से प्राप्त कर सकते हैं। (Kavya Prayojan)
- पंडितराज जगन्नाथ: उन्होंने ‘कीर्ति’ और ‘परम आल्हाद’ (अत्यधिक आनंद) को ही मुख्य प्रयोजन स्वीकार किया।
6. हिंदी कवियों और विचारकों का मत (Kavya Prayojan)
भारतीय परंपरा के प्रभाव में हिंदी के आचार्यों ने भी इस पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला:
- तुलसीदास: इन्होंने “स्वांतः सुखाय” (स्वयं के सुख के लिए) के साथ “लोकहित” को अनिवार्य माना। उनके अनुसार वही कविता श्रेष्ठ है जो गंगा की तरह सबका भला करे। (Kavya Prayojan)
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल: शुक्ल जी ने काव्य का परम प्रयोजन “हृदय की मुक्तावस्था” और “लोक-मंगल” माना। उनके अनुसार काव्य मनुष्य की स्वार्थ-बद्ध चेतना को व्यापक सत्य से जोड़ता है। (Kavya Prayojan)
- हजारी प्रसाद द्विवेदी: वे मानते थे कि साहित्य का उद्देश्य “मनुष्यता” को बचाए रखना है।
भारतीय आचार्यों के मतों का विश्लेषण करने पर हम दो मुख्य निष्कर्षों पर पहुँचते हैं:
- कलात्मक आनंद (Aesthetic Pleasure): लगभग सभी आचार्यों ने ‘प्रीति’ या ‘परनिर्वृति’ को सर्वोच्च माना है। यदि काव्य आनंद नहीं देता, तो वह उपदेशात्मक शास्त्र बनकर रह जाएगा।
- नैतिक एवं सामाजिक उत्थान (Social Welfare): काव्य केवल मनोरंजन नहीं है, वह ‘शिव’ (कल्याण) का माध्यम है। यह व्यक्ति को समाज के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाता है। (Kavya Prayojan)
भारतीय चिंतन में काव्य का प्रयोजन केवल भौतिक लाभ (यश, धन) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा के आनंद से लेकर मोक्ष तक की यात्रा तय करता है। मम्मट का ‘कान्तासम्मित उपदेश’ और ‘सद्यः परनिर्वृत्ति’ आज भी काव्य-समीक्षा के सबसे महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं। (Kavya Prayojan)