छंद
भारतीय काव्यशास्त्र में ‘छंद’ वह विद्या है जो कविता को अनुशासन, लय और संगीतात्मकता प्रदान करती है। छंद शास्त्र के आदि प्रवर्तक आचार्य पिंगल माने जाते हैं, इसीलिए इसे ‘पिंगल शास्त्र’ भी कहा जाता है। अक्षरों की संख्या, गणना, मात्रा, यति (विराम) और गति (लय) के व्यवस्थित मेल को छंद कहते हैं।
छंदों को मुख्य रूप से उनकी गणना पद्धति के आधार पर मात्रिक और वर्णिक श्रेणियों में बाँटा गया है। यहाँ आपके द्वारा पूछे गए प्रमुख छंदों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है:
1. वर्णिक छंद (Varnik Chhand)
वर्णिक छंदों में केवल ‘वर्णों’ (अक्षरों) की गणना की जाती है। इसमें लघु-गुरु का क्रम निश्चित होता है।
(क) सवैया (Savaiya)
सवैया एक अत्यंत लोकप्रिय वर्णिक छंद है। इसमें 22 से 26 वर्ण होते हैं। सवैया के कई भेद हैं (जैसे मत्तगयंद, सुमुखी, किरीट आदि), जिनमें ‘मत्तगयंद’ सर्वाधिक प्रचलित है।
- लक्षण: यह चार चरणों का समवर्णिक छंद है।
- उदाहरण:
“मानुस हों तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।”
- विशेषता: रसखान के सवैये हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इसमें लय और प्रवाह बहुत तीव्र होता है।
(ख) घनाक्षरी (Ghanakshari)
घनाक्षरी को ‘कवित्त’ भी कहा जाता है। यह एक दंडक छंद है जिसमें वर्णों की संख्या अधिक होती है। इसके प्रमुख भेदों में ‘मनहरण घनाक्षरी’ सबसे प्रसिद्ध है।
- लक्षण: इसमें 31 वर्ण होते हैं। 16 और 15 वर्णों पर यति (विराम) होती है। अंतिम वर्ण गुरु होता है।
- उदाहरण:
“साजि चतुरंग बीर रँग में तुरंग चढ़ि, सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है।” (भूषण)
- विशेषता: इसका प्रयोग वीर रस और भक्ति रस की कविताओं में भव्यता लाने के लिए किया जाता है।
2. सममात्रिक छंद (Sam-Matrik Chhand)
जहाँ छंद के सभी चारों चरणों में मात्राओं की संख्या समान होती है, उसे सममात्रिक छंद कहते हैं।
(क) चौपाई (Chaupai)
चौपाई हिंदी साहित्य, विशेषकर ‘रामचरितमानस’ का आधार स्तंभ है।
- लक्षण: इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अंत में दो गुरु (SS) होना शुभ माना जाता है और अंत में ‘जगण’ (ISI) या ‘तगण’ (SSI) वर्जित है।
- उदाहरण:
“बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥”
- मात्रा गणना: II + II + II + II + III + SI = 16 मात्राएँ।
(ख) हरिगीतिका (Harigitika)
यह मात्रिक छंदों में अत्यंत मधुर और लयबद्ध छंद माना जाता है।
- लक्षण: इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं। 16 और 12 मात्राओं पर यति होती है। चरण के अंत में लघु-गुरु (IS) अनिवार्य है।
- उदाहरण:
“अन्याय सहकर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है। न्यायरथ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है।” (मैथिलीशरण गुप्त)
3. अर्द्धसममात्रिक छंद (Ardhasam-Matrik Chhand)
जहाँ पहले और तीसरे चरण की मात्राएँ एक समान हों तथा दूसरे और चौथे चरण की मात्राएँ एक समान हों, उसे अर्द्धसममात्रिक छंद कहते हैं।
(क) बरवै (Barvai)
बरवै छंद गोस्वामी तुलसीदास और रहीम को अत्यंत प्रिय था।
- लक्षण: इसमें पहले और तीसरे (विषम) चरणों में 12-12 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे (सम) चरणों में 7-7 मात्राएँ होती हैं। कुल 19 मात्राएँ होती हैं।
- उदाहरण:
“चंपक हरवा अँग मिलि, अधिक सोहाइ। जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हिलाइ।”
(ख) सोरठा (Sortha)
सोरठा छंद दोहा का ठीक उल्टा होता है।
- लक्षण: इसके पहले और तीसरे चरण में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अंत में तुक मिलता है।
- उदाहरण:
“जो सुमरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन। करहु अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।”
4. विषम मात्रिक छंद (Visham Matrik Chhand)
जहाँ चरणों की संख्या चार से अधिक (प्रायः छह) होती है और मात्राओं का नियम जटिल होता है, उन्हें विषम छंद कहते हैं। ये दो छंदों के मेल से बनते हैं।
(क) कुंडलिया (Kundaliya)
यह दोहा + रोला के मेल से बनता है।
- लक्षण: इसमें 6 चरण होते हैं। प्रथम 2 चरण दोहा के और अंतिम 4 चरण रोला के होते हैं। जिस शब्द से यह छंद शुरू होता है, उसी पर समाप्त होता है। दोहे का अंतिम चरण रोला का प्रथम चरण बनता है।
- उदाहरण:
“लाठी में गुन बहुत हैं, सदा राखिये संग… (अंत में) कह गिरिधर कविराय, सदा राखिये लाठी।”
(ख) छप्पय (Chhappay)
यह रोला + उल्लाला के मेल से बनता है।
- लक्षण: इसमें भी 6 चरण होते हैं। प्रथम 4 चरण रोला (24-24 मात्राएँ) के और अंतिम 2 चरण उल्लाला (28-28 मात्राएँ) के होते हैं।
- उदाहरण:
“नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है। सूर्य-चंद्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥”
निष्कर्ष
छंदों का ज्ञान काव्य को स्थिरता और गंभीरता प्रदान करता है। जहाँ सवैया और घनाक्षरी जैसे वर्णिक छंदों ने मध्यकालीन काव्य को वैभव दिया, वहीं चौपाई और सोरठा ने जन-मानस में भक्ति की धारा प्रवाहित की। कुंडलिया और छप्पय जैसे छंद अपनी जटिल संरचना के कारण नीति और वीरता के वर्णन में विशेष रूप से सहायक रहे हैं। आधुनिक काल में ‘मुक्त छंद’ का चलन बढ़ा है, किंतु शास्त्रीय छंदों का आधार आज भी अटल है।