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वसंत आ गया है (निबंध) : हजारीप्रसाद द्विवेदी
जिस स्थान पर बैठकर लिख रहा हूँ, उसके आस-पास कुछ थोड़े-से पेड़ हैं। एक शिरीष हैं, जिस पर लंबी-लंबी सुखी छिमियाँ अभी लटकी हुई हैं। पत्ते कुछ झड़ गए हैं और कुछ झडऩे के रास्ते में हैं। जरा-सी हवा चली नहीं कि अस्थिमालिकावाले उन्मत्त कापालिक!-->…
लोभ और प्रीति (निबंध) : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
किसी प्रकार का सुख या आनंद देने वाली वस्तु के संबंध में मन की ऐसी स्थिति को जिसमें उस वस्तु के अभाव को भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जग पड़े, लोभ कहते हैं। दूसरे की वस्तु का लोभ करके लोग उसे लेना चाहते हैं, अपनी!-->…
घनानन्द के पद, हिन्दी-‘ग’
पद
अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। तहाँ साँचे चलें तजि आपनपी झिझकैं कपटी जे निसाँक नहीं॥ घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक ते दूसरो आँक नहीं। तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं।।
रावरे रूप की!-->!-->!-->!-->!-->…
बिहारी के दोहे, हिन्दी-‘ग’
दोहे
मेरी भववाधा हरौ, राधा नागरि सोय। जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय।।
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय। वा खाये बौराये नर, वा पाए बौराये।।
कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात। भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात।।
सूरदास के पद हिन्दी-‘ग’
पद
मैया! मैं नहिं माखन खायौ। ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरे मुख लपटायी॥ देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँच धरि लटकायी। हौं जु कहत नान्हे कर अपने मैं कैसें करि पायौ॥ मुख दधि पछि, बुद्धि इक कीन्ही, दोना पीठि दुरायौ। डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा,!-->!-->!-->…
कबीर के दोहे- बी.ए. प्रोग्राम हिन्दी-‘ग’
दोहे
भली भई जु गुर मिल्या, नहीं तर होती हाणि। दीपक दिष्टि पतंग ज़्यूं, पड़ता पूरी जाणि।।19।।
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पंडत। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत।।20।।
सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिपाही माहै चूक। भावै त्यूं!-->!-->!-->!-->!-->!-->!-->…
हिंदी की प्रमुख बोलियों का परिचय
1. खड़ीबोली
आधुनिक हिंदी का मानकीकृत रुप खड़ी बोली को माना जाता है। खड़ी बोली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश के पश्चिमी हिंदी उपभाषा से हुआ है। हिन्दुस्तानी, उर्दू, दक्खिनी हिंदी का आधार भी खड़ी बोली को माना जाता है। 'खड़ी बोली' शब्द की!-->!-->!-->…
केवट प्रसंग: रामचरितमानस – तुलसीदास सप्रसंग व्याख्या
दोहा : रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं ॥99॥
जासु वियोग बिल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसे॥ बरबस राम सुमंत्र पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए ॥1॥ मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु!-->!-->!-->…
कबीर के दोहे
निम्नलिखित दोहे बी.ए. प्रोग्राम के GE हिन्दी-ख में लगे हुए हैं।
सतगुर मिल्या त का भया, जे मनि पाड़ी भोल। पासि बिनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल।।24।।
बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमंकि। भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े!-->!-->!-->!-->!-->…
बिहारी दोहे संख्या: 1, 10, 13, 32
(1)
मेरी भाव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परै स्यामु हरित-दुति होई।।1।।
(10)
फिरि फिरि चितु उत हीं रहतु,, टुटी लाज की लाव। अंग-अंग-छबि-झौर मैं भयौ भौंर की नाव।।10।।
(13)
जोग-जुगति सिखए सबै मनौ महामुनि मैन। चाहत!-->!-->!-->!-->!-->!-->!-->!-->!-->!-->!-->…