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रस निष्पत्ति
भारतीय काव्यशास्त्र में 'रस निष्पत्ति' का विषय सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा का केंद्र रहा है। रस का अर्थ है 'आनंद' और निष्पत्ति का अर्थ है 'सिद्धि' या 'प्रकटीकरण'। काव्य को पढ़ने या नाटक को देखने से जिस अनिर्वचनीय आनंद की प्राप्ति होती है, उसे!-->…
शब्द शक्ति : अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना (shabd shakti)
भारतीय काव्यशास्त्र में शब्द और अर्थ का संबंध अविच्छिन्न माना गया है। शब्द 'शरीर' है और अर्थ उसकी 'आत्मा'। किसी शब्द को सुनने या पढ़ने के बाद उससे जो अर्थ निकलता है, उस अर्थ को स्पष्ट करने वाली शक्ति को ही 'शब्द शक्ति' कहा जाता है। (shabd!-->…
रस : स्वरूप, अवयव और भेद (रस संप्रदाय)
भारतीय काव्यशास्त्र में 'रस' (रस संप्रदाय) को काव्य की आत्मा माना गया है। रस का शाब्दिक अर्थ है 'आनंद' या 'स्वाद'। जिस प्रकार भोजन का स्वाद जिह्वा से लिया जाता है, उसी प्रकार काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक को देखने से जिस अलौकिक आनंद की!-->…
भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा (Bhartiya Kavyashastra)
भारतीय काव्यशास्त्र (Bhartiya Kavyashastra) की परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और सुसंगठित साहित्यिक आलोचना-परंपराओं में से एक है। इस परंपरा का उद्देश्य केवल काव्य की रचना-पद्धति का विश्लेषण करना नहीं, बल्कि काव्य के सौंदर्य, भावात्मक!-->…
प्रमुख संप्रदाय (pramukh sampraday aur siddhant)
भारतीय काव्यशास्त्र का इतिहास लगभग दो हजार वर्षों की निरंतर चिंतन परंपरा का इतिहास है। काव्य की 'आत्मा' या उसके सबसे महत्वपूर्ण तत्व की खोज में आचार्यों ने विभिन्न दृष्टिकोण अपनाए, जिससे छह प्रमुख संप्रदायों का जन्म हुआ। इन संप्रदायों ने!-->…
काव्य लक्षण
भारतीय काव्यशास्त्र में 'काव्य लक्षण' का अर्थ है—काव्य की परिभाषा या उसके अनिवार्य स्वरूप का निर्धारण करना। जिस प्रकार किसी वस्तु की पहचान उसके विशिष्ट गुणों से होती है, उसी प्रकार आचार्यों ने काव्य को अन्य विधाओं (शास्त्र, इतिहास आदि) से!-->…
काव्य हेतु (Kavya Hetu)
काव्य हेतु (Kavya Hetu) का अर्थ है - काव्य के लिए अथवा काव्य सृजन के लिए। अर्थात वे तत्व जो काव्य के सृजन के लिए आवश्यक हैं। भारतीय काव्यशास्त्र में विभिन्न आचार्यों ने काव्य-हेतु के स्वरूप और उसकी संख्या को लेकर भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत!-->…
प्रेमचंद के साथ दो दिन : बनरसीदास चतुर्वेदी (premchand ke sath do din)
प्रेमचंदजी की सेवा में उपस्थित होने की इच्छा बहुत दिनों से थी। यद्यपि आठ वर्ष पहले लखनऊ में एक बार उनके दर्शन किए थे, पर उस समय अधिक बातचीत करने का मौका नहीं मिला था। इन आठ वर्षों में कई बार काशी जाना हुआ, पर प्रेमचंदजी उन दिनों काशी में!-->…
लोभ और प्रीति : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (lobh aur priti)
किसी प्रकार का सुख या आनंद देने वाली वस्तु के संबंध में मन की ऐसी स्थिति को जिसमें उस वस्तु के अभाव को भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जग पड़े, लोभ कहते हैं। दूसरे की वस्तु का लोभ करके लोग उसे लेना चाहते हैं, अपनी!-->…