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विज्ञापन के उद्देश्य (vigyapan ke uddeshy)

आज के तकनीकी और आधुनिक युग में विज्ञापन का उद्देश्य केवल चकाचौंध को दिखाना नहीं है। विज्ञापन का उद्देश्य केवल उत्पादों की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इसके प्रमुख उद्देश्यों का

vigyapan arth paribhasha aur mahatva

विज्ञापन आधुनिक युग में बाज़ार और जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया है। चाहे हम सड़क पर चल रहे हों, टीवी देख रहे हों या इंटरनेट का उपयोग कर रहे हों, विज्ञापन हर जगह मौजूद हैं। विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को उत्पादों या सेवाओं के

छंद

भारतीय काव्यशास्त्र में 'छंद' वह विद्या है जो कविता को अनुशासन, लय और संगीतात्मकता प्रदान करती है। छंद शास्त्र के आदि प्रवर्तक आचार्य पिंगल माने जाते हैं, इसीलिए इसे 'पिंगल शास्त्र' भी कहा जाता है। अक्षरों की संख्या, गणना, मात्रा, यति

अलंकार : शब्दालंकार/अर्थालंकार (alankar)

भारतीय काव्यशास्त्र में अलंकार (alankar) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। 'अलंकार' का शाब्दिक अर्थ है— 'आभूषण' या 'गहना'। जिस प्रकार आभूषण नारी के शारीरिक सौंदर्य में वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य के सौंदर्य को बढ़ाते हैं। आचार्य

साधारणीकरण/sadharanikaran

भारतीय काव्यशास्त्र में 'साधारणीकरण' (sadharanikaran) रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण सोपान है। साधारण शब्दों में कहें तो साधारणीकरण वह चमत्कारिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से काव्य के पात्र या घटनाएँ अपनी विशिष्टता (निजी

रस निष्पत्ति

भारतीय काव्यशास्त्र में 'रस निष्पत्ति' का विषय सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा का केंद्र रहा है। रस का अर्थ है 'आनंद' और निष्पत्ति का अर्थ है 'सिद्धि' या 'प्रकटीकरण'। काव्य को पढ़ने या नाटक को देखने से जिस अनिर्वचनीय आनंद की प्राप्ति होती है, उसे

शब्द शक्ति : अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना (shabd shakti)

भारतीय काव्यशास्त्र में शब्द और अर्थ का संबंध अविच्छिन्न माना गया है। शब्द 'शरीर' है और अर्थ उसकी 'आत्मा'। किसी शब्द को सुनने या पढ़ने के बाद उससे जो अर्थ निकलता है, उस अर्थ को स्पष्ट करने वाली शक्ति को ही 'शब्द शक्ति' कहा जाता है। (shabd

रस : स्वरूप, अवयव और भेद (रस संप्रदाय)

भारतीय काव्यशास्त्र में 'रस' (रस संप्रदाय) को काव्य की आत्मा माना गया है। रस का शाब्दिक अर्थ है 'आनंद' या 'स्वाद'। जिस प्रकार भोजन का स्वाद जिह्वा से लिया जाता है, उसी प्रकार काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक को देखने से जिस अलौकिक आनंद की

भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा (Bhartiya Kavyashastra)

भारतीय काव्यशास्त्र (Bhartiya Kavyashastra) की परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और सुसंगठित साहित्यिक आलोचना-परंपराओं में से एक है। इस परंपरा का उद्देश्य केवल काव्य की रचना-पद्धति का विश्लेषण करना नहीं, बल्कि काव्य के सौंदर्य, भावात्मक

प्रमुख संप्रदाय (pramukh sampraday aur siddhant)

भारतीय काव्यशास्त्र का इतिहास लगभग दो हजार वर्षों की निरंतर चिंतन परंपरा का इतिहास है। काव्य की 'आत्मा' या उसके सबसे महत्वपूर्ण तत्व की खोज में आचार्यों ने विभिन्न दृष्टिकोण अपनाए, जिससे छह प्रमुख संप्रदायों का जन्म हुआ। इन संप्रदायों ने