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प्रमुख संप्रदाय (pramukh sampraday aur siddhant)

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भारतीय काव्यशास्त्र का इतिहास लगभग दो हजार वर्षों की निरंतर चिंतन परंपरा का इतिहास है। काव्य की ‘आत्मा’ या उसके सबसे महत्वपूर्ण तत्व की खोज में आचार्यों ने विभिन्न दृष्टिकोण अपनाए, जिससे छह प्रमुख संप्रदायों का जन्म हुआ। इन संप्रदायों ने काव्य के बाह्य शरीर (शब्द-अर्थ) से लेकर उसकी आंतरिक चेतना (रस-ध्वनि) तक का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। (pramukh sampraday aur siddhant)

नीचे भारतीय काव्यशास्त्र के छह प्रमुख संप्रदायों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. रस संप्रदाय (Rasa Sampradaya)

यह भारतीय काव्यशास्त्र का सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित संप्रदाय है।

  • प्रवर्तक: आचार्य भरतमुनि (ग्रंथ: नाट्यशास्त्र)। (pramukh sampraday aur siddhant)
  • मूल सिद्धांत: भरतमुनि ने अपना प्रसिद्ध रस-सूत्र दिया— “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः”। अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
  • महत्व: रस संप्रदाय काव्य के भाव पक्ष को सर्वोपरि मानता है। परवर्ती आचार्य विश्वनाथ ने तो यहाँ तक कह दिया कि “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” (रसपूर्ण वाक्य ही काव्य है)।
  • प्रक्रिया: हृदय में स्थित ‘स्थायी भाव’ जब विभाव आदि के माध्यम से जाग्रत होकर आनंद की अवस्था तक पहुँचते हैं, तो उसे ‘रस’ कहा जाता है। इसे ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ (ईश्वरीय आनंद के समान) माना गया है।
  • प्रमुख आचार्य : भट्टलोल्लट, शंकुक, भटटनायक, अभिनव गुप्त, आनंदवर्धन, मम्मट, विश्वनाथ।

2. अलंकार संप्रदाय (Alankara Sampradaya)

यह संप्रदाय काव्य के बाह्य सौंदर्य और चमत्कार पर बल देता है।

  • प्रवर्तक: आचार्य भामह (ग्रंथ: काव्यालंकार)। अन्य प्रमुख आचार्य: दण्डी, उद्भट।
  • मूल सिद्धांत: भामह के अनुसार, जिस प्रकार एक सुंदर स्त्री का मुख आभूषणों के बिना शोभा नहीं पाता, उसी प्रकार बिना अलंकारों के कविता शोभाहीन है (“न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम्”)।
  • महत्व: इस संप्रदाय ने माना कि शब्द और अर्थ की वक्रता या वैचित्र्य ही काव्य की विशेषता है। उन्होंने काव्य के आंतरिक तत्वों को भी अलंकारों के भीतर ही समाहित करने का प्रयास किया। (pramukh sampraday aur siddhant)
  • प्रमुख आचार्य : दंडी, उद्भट, रुद्रट, जयदेव, भोज, अप्पयदीक्षित।

3. रीति संप्रदाय (Riti Sampradaya)

रीति संप्रदाय ने काव्य के गुणात्मक संगठन और ‘शैली’ (Style) को महत्व दिया।

  • प्रवर्तक: आचार्य वामन (ग्रंथ: काव्यालंकार सूत्रवृत्ति)।
  • मूल सिद्धांत: वामन ने स्पष्ट घोषणा की— “रीतिरात्मा काव्यस्य” (रीति ही काव्य की आत्मा है)।
  • परिभाषा: विशिष्ट पद-रचना को रीति कहा जाता है। यह विशिष्टता ‘गुणों’ (माधुर्य, ओज, प्रसाद) पर आधारित होती है।
  • भेद: वामन ने तीन रीतियाँ मानीं— वैदर्भी (सर्वश्रेष्ठ), गौड़ी, और पांचाली। यह संप्रदाय काव्य के शिल्प विधान का व्यवस्थित विश्लेषण करता है। (pramukh sampraday aur siddhant)

4. ध्वनि संप्रदाय (Dhwani Sampradaya)

यह संप्रदाय भारतीय काव्यशास्त्र के इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ माना जाता है।

  • प्रवर्तक: आचार्य आनंदवर्धन (ग्रंथ: ध्वन्यालोक)।
  • मूल सिद्धांत: आनंदवर्धन ने कहा— “काव्यस्य आत्मा ध्वनिः”
  • महत्व: इस संप्रदाय ने शब्द की तीन शक्तियों (अभिधा, लक्षणा, व्यंजना) में से ‘व्यंजना’ को सर्वोपरि माना। ध्वनि का अर्थ है—वह अर्थ जो शब्दों के वाच्यार्थ (Direct meaning) से अलग और अधिक गहरा (Suggested meaning) होता है।
  • प्रकार: वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि और रस ध्वनि। यहाँ ‘रस’ को भी ध्वनि के माध्यम से ही प्राप्त होना अनिवार्य माना गया। (pramukh sampraday aur siddhant)
  • प्रमुख आचार्य : अभिनव गुप्त, मम्मट, पंडित्रज जगन्नाथ।

5. वक्रोक्ति संप्रदाय (Vakrokti Sampradaya)

वक्रोक्ति संप्रदाय काव्य को सहज कथन से अलग एक विशेष कलात्मक अभिव्यक्ति मानता है।

  • प्रवर्तक: आचार्य कुन्तक (ग्रंथ: वक्रोक्ति जीवितम्)।
  • मूल सिद्धांत: कुन्तक ने कहा— “वक्रोक्तिः काव्य जीवितम्” (वक्रोक्ति ही काव्य का जीवन या प्राण है)।
  • अवधारणा: साधारण कथन को जब कवि अपनी प्रतिभा से विलक्षण या टेढ़ा (वक्र) बना देता है, तो वह काव्य बन जाता है। कुन्तक ने वक्रोक्ति के छह भेद किए (वर्ण विन्यास वक्रता से लेकर प्रबंध वक्रता तक), जो आधुनिक ‘कलावादी’ दृष्टिकोण के निकट है। (pramukh sampraday aur siddhant)

6. औचित्य संप्रदाय (Auchitya Sampradaya)

यह संप्रदाय सभी संप्रदायों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला संप्रदाय माना जाता है।

  • प्रवर्तक: आचार्य क्षेमेन्द्र (ग्रंथ: औचित्य विचार चर्चा)। (pramukh sampraday aur siddhant)
  • मूल सिद्धांत: क्षेमेन्द्र के अनुसार— “औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्”
  • अवधारणा: काव्य के सभी अंग (अलंकार, गुण, रीति, रस) तभी शोभा देते हैं जब वे अपने स्थान पर उचित (Appropriate) हों। जैसे—गलत जगह पहना गया आभूषण उपहास का कारण बनता है, वैसे ही अनौचित्य रस का विनाश (रसभंग) कर देता है। औचित्य ही वह तत्व है जो काव्य के अंगों को परस्पर जोड़कर उसे सजीव बनाता है।

तुलनात्मक मूल्यांकन (pramukh sampraday aur siddhant)

भारतीय काव्यशास्त्र के इन छह संप्रदायों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:

  1. कलावादी संप्रदाय: अलंकार, रीति, और वक्रोक्ति। ये काव्य के शरीर और शिल्प (External) पर अधिक ध्यान देते हैं।
  2. आत्मवादी संप्रदाय: रस, ध्वनि, और औचित्य। ये काव्य की आत्मा और भाव (Internal) की गहराई में उतरते हैं।
संप्रदायप्रवर्तकमुख्य तत्व (आत्मा)दृष्टिकोण
रसभरतमुनिरस (आनंद)मनोवैज्ञानिक और भावप्रधान
अलंकारभामहअलंकार (आभूषण)बाह्य सौंदर्य और चमत्कार
रीतिवामनरीति (पद-रचना)शिल्प और गुण आधारित
ध्वनिआनंदवर्धनध्वनि (व्यंग्यार्थ)व्यंजना और अर्थ की गहराई
वक्रोक्तिकुन्तकवक्रोक्ति (टेढ़ापन)अभिव्यक्ति की कलात्मकता
औचित्यक्षेमेन्द्रऔचित्य (उचितता)समन्वय और संतुलन

आधुनिक प्रासंगिकता (pramukh sampraday aur siddhant)

आज के युग में भी ये संप्रदाय साहित्य की समीक्षा के लिए अनिवार्य उपकरण प्रदान करते हैं। आधुनिक आलोचक जब किसी कविता की ‘इमेज’ या ‘शैली’ की बात करते हैं, तो वे अनजाने में रीति और वक्रोक्ति का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। जब हम कविता के सामाजिक प्रभाव या संवेदना की बात करते हैं, तो वह रस और ध्वनि के अंतर्गत आता है।

विशेषकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रस संप्रदाय को आधुनिक मनोविज्ञान से जोड़कर पुनर्जीवित किया। छायावादी कवियों ने ध्वनि और वक्रोक्ति का भरपूर उपयोग किया। (pramukh sampraday aur siddhant)

भारतीय काव्यशास्त्र के ये छह संप्रदाय परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि रस काव्य का ‘प्राण’ है, तो ध्वनि उसका ‘अदृश्य प्रकाश’ है, अलंकार उसके ‘आभूषण’ हैं, रीति उसका ‘ढाँचा’ है, वक्रोक्ति उसकी ‘वाणी’ है और औचित्य उसका ‘संयम’ है। एक सफल और कालजयी कृति में इन सभी तत्वों का संतुलित समावेश होता है। मम्मट जैसे परवर्ती आचार्यों ने इन सभी का समन्वय कर काव्यशास्त्र को पूर्णता प्रदान की। (pramukh sampraday aur siddhant)

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