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सगुण भक्ति धारा: राम, कृष्ण काव्य

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सगुण : रामभक्ति काव्यधारा

भक्ति की सगुण शाखा में उपासक भगवान के सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपों को देखता है। पर उपासना सुविधा के लिए वह सगुण रूप को ही प्रधानता देता है, जो अपनी साकार लीलाओं द्वारा लोकजीवन में व्याप्त हो सके। सगुण में राम भक्ति के प्रवर्तक थे स्वामी रामानंद। कुछ विद्वानों ने वैदिक साहित्य में राम, सीता, दशरथ, जनक, लक्षमण आदि नामों को देखकर रामभक्ति का संबंध वेदों से जोड़ने का प्रयास किया, किन्तु वैदिक साहित्य में रामकथा उस रूप में नहीं है जो बाद में रामायण में मिलती है। पुराणों में रामकथा बहुत कुछ वाल्मीकि के अनुसार ही है। 8वीं शताब्दी में शंकराचार्य ने अद्वैतवाद का निरूपण किया उनका मायावाद भक्ति के लिए उपयुक्त न था। अतः भक्ति के सम्यक प्रचार के लिए जिस दृढ़ आधार की आवश्यकता थी वह रामानुजाचार्य ने (1073) खड़ा किया। उनके अनुसार चराचर ब्रह्म का अंश है और भक्ति द्वारा ब्रह्म को पाया जा सकता है। रामानुज के शिष्य परंपरा में रामानन्द हुए जिन्होंने उपासना के लिए विष्णु का रूप न लेकर लोक में लीला करने वाले उनके अवतार राम का आश्रय किया और राम नाम को मूल मंत्र बताया। रामानंद को रामभक्ति परम्परा के चिंतन का मेरुदण्ड कहा जाता है। उनका योगदान दो रूपों में उल्लेखनीय है- हिन्दी भाषा को अपनाना और शूद्रों तथा स्त्रियों को भी भक्ति का अधिकारी बनाना। रामानंद के शिष्य हुए तुलसी यद्यपि रामभक्ति धारा में अनेक कवि हुए किंतु उसका साहित्यिक महत्त्व अकेले तुलसीदास के कारण है। उनके काव्य में रामभक्ति साहित्य की सारी प्रवृत्तियों के दर्शन होते हैं।

18वीं शताब्दी में रामभक्तिधारा में एक नया मोड़ आया जिसके प्रवर्तक हैं अग्रदास। उन्होंने जानकी की एक सखी की भावना से रामभक्ति की। इस प्रकार रामभक्ति में रसिकता की भावना का प्रवेश हुआ। इस रसिक संप्रदाय के प्रमुख कवि हुए- प्राणचंद चौहान, हृदय राम अग्रदास, नाभादास, महाराज विश्वनाथ, महाराज रघुनाथ सिंह। जैसा की नाम से ही स्पष्ट है इस काव्य का प्रधान रस या शृंगार। इसमें सीता वल्लभ की लीलाओं का, उनके ऐश्वर्य का, उनके मधुर रति आदि का वर्णन किया गया। इस काव्य के कारण राम काव्य लाक्षित हुआ, क्योंकि उसने तुलसी के मर्यादा रूप का अनुसरण न कर रीतिकाल के कवियों का उच्छृखल मार्ग अपनाया।

रामभक्ति शाखा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

(i)      रामभक्ति भावना : भारतीय भक्ति भावना की प्राचीन परम्परा तथा वैष्णव चिन्तन में राम-भक्ति की महत्त्व प्रतिष्ठा देखकर सहसा ही यह विश्वास होता है कि रामभक्ति के विकास में वैष्णव चिंतन की आगम (लोक) निगम (वेद) परम्पराओं का बहुत बड़ा हाथ रहा है।

रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में श्री रामानंद के अनुयायी सभी रामभक्त कवि विष्णु के अवतार दशरथ पुत्र राम के उपासक हैं। अवतारवाद में विश्वास रखने वाले हैं। उनके राम परब्रह्म स्वरूप हैं। उनमें शील, शक्ति और सौंदर्य का समन्वय है, सौंदर्य में वे त्रिभुवन को जलावन हारे हैं। शक्ति से वे दुष्टों का दमन और भक्तों की रक्षा करते हैं तथा गुणों से संसार को आचार की शिक्षा देते हैं। वे मर्यादापुरुषोत्तम और लोकरक्षक हैं। रामभक्ति की सशक्त अभिव्यक्ति काव्य के रूप में हुई, श्री सम्प्रदाय के आचार्यों ने रामभक्ति काव्य की शास्त्रीय दार्शनिक भूमिका तैयार की।

 (ii)    भक्ति का स्वरूप : इनकी भक्ति में सेवक-सेव्य भाव है। वे दास्य भाव से राम की अराधना करते हैं। वे स्वयं को क्षुद्रातिक्षुद्र तथा भगवान को महान बतलाते हैं। तुलसीदास ने लिखा है- “सेवक-सेव्य भाव बिन भव न तरिय उरगारि।” राम-काव्य में ज्ञान, कर्म और भक्ति की पृथक-पृथक महत्ता स्पष्ट करते हुए भक्ति को उत्कृष्ट बताया गया है। तुलसीदास ने भक्ति और ज्ञान में अभेद माना है- “भगतहिं ज्ञानहिं नहिं कुछ भेद । यद्यपि वे ज्ञान के कठिन मार्ग तथा भक्ति को सरल और सहज मार्ग स्वीकार करते हैं। इसके अतिरिक्त तुलसी की भक्ति का रूप वैधी रहा है, वह वेदशास्त्र भी मर्यादा के अनुकूल है।

(iii)    लोक-मंगल की भावना : रामभक्ति काव्य में ‘लोक धर्म’, ‘लोक चिन्ता’, ‘लोक मानस’, ‘लोकरक्षा’ तथा ‘लोक मंगल’ की भावना का प्राधान्य है। तुलसी के राम मर्यादापुरुषोत्तम तथा आदर्शों के संस्थापक है। इस काव्यधारा में आदर्श पात्रों की सर्जना हुई है। राम आदर्श पुरुष तथा आदर्श राजा हैं, सीता आदर्श पत्नी है तो भरत और लक्ष्मण आदर्श भाई है। कौशल्या आदर्श माता, हनुमान आदर्श सेवक हैं। इस प्रकार रामचरितमानस में तुलसी ने आदर्श गृहस्थ आदर्श समाज और आदर्श राज्य की कल्पना की है। आदर्श की प्रतिष्ठा से ही तुलसी लोकनायक कवि बन गए हैं और उनका काव्य लोकमंगल की भावना से ओतप्रोत है। गरीबी-भुखमरी-दरिद्रता का जितना वर्णन अकेले तुलसी ने अपनी रचनाओं में किया है उतना मध्य युग के किसी अन्य कवि ने नहीं ‘कालि बारहि बार अकाल परै’, ‘खेती न किसान को भिखारी को भीख बलि’, ‘बनिक को खनिज न चाकर को चाकरी।’

(iv)    रामकाव्य परम्परा में नारी : रामभक्ति काव्य में नारी को लेकर जो बातें कही गयी, दुर्भाग्यवश उनका गलत प्रचार किया गया है। तुलसी की तो नारी विरोधी छवि ही बना डाली है। जबकि रामभक्ति धारा नैतिकतावादी-मर्यादावादी मूल्यों पर ही टिकी विचारधारा है और तुलसी के ग्रंथ लोक-जीवन में आचार-शास्त्र का काम करते रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि तुलसी ने मीराबाई को पत्र लिखकर जीवन का रास्ता दिखाया था ‘जाकै प्रिय राम वैदेही, तजिए ताहि कौटि बैरी सम जद्यपी परम सनेही। ऐसे तुलसीदास को नारी विरोधी कहने का क्या अर्थ है? तुलसी के ‘रामचरितमानस’, ‘कवितावली’ को बिना पढ़े बिना सही संदर्भ से समझे तुलसी की निंदा की जाती है। ‘वन्दौ कौसल्या दिशि प्राची’ कह राम की माता की वन्दना करते हैं- सीता को जगत-जननी कहते हैं और शिव के साथ पार्वती का आदर करते हैं। नारी के प्रति तुलसी में आदर न होता तो राम-कथा में राम, सीता के लिए मारे–मारे न फिरते। राम के अवध लौटने पर नारियाँ ही आगे हैं- नारि-समुद्र उमड पड़ा है। कैकयी से राम क्षमा न माँगते– ‘प्रथम तासु हार गए भवानी’ इस प्रकार राम-कथा में नारी की महिमा है यही महिमा गान मैथिलीशरण के ‘साकेत’ और निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’ काव्य की शक्ति बना है।

(v)     राम काव्य में समन्वय साधना : हिन्दी में रामभक्ति काव्यधारा अपनी उदार समन्वय साधना के कारण बड़े आदर से याद की जाती है। इस समन्वय साधना का सर्वोत्तम रूप तुलसीदास के रचना-कर्म में प्रतिफलित हुआ है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कहना है कि लोक-नायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके। ध्यान में रखने की बात है कि विरुद्धों में सामंजस्य स्थापित करना सरल कार्य नहीं है, उसके लिए अक्ल धीरज चाहिए। यह अक्ल और धीराज, समन्वय के साधक तुलसीदास में है- ‘उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चिष्टा है, लोक-शास्त्र का समन्वय, गार्हस्थ्य और वैराग्य का समन्वय, भाषा और संस्कृत का समन्वय, ब्राह्मण और चाण्डाल का समन्वय, निर्गुण और सगुण का समन्वय, कथा-तत्त्वज्ञान का समन्वय, पाण्डित्य और अपाण्डित्य का समन्वय ‘रामचरितमानस’ शुरू से आखिर तक समन्वय का काव्य है।’ हिन्दी में आगम-निगम परम्परा का इतना बड़ा जानकर और समन्वयकार कोई दूसरा नहीं हुआ।

शिल्पगत विशेषताएँ

(i)     काव्य रूप : रामभक्ति काव्यधारा की कविताएँ मुख्यतः प्रबन्धात्मक हैं क्योंकि इन कवियों की मूल दृष्टि समाज को व्यवस्थित, अनुशासित व मर्यादित करने की है। ‘रामचरितमानस’ हिन्दी का सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य है जो इसी धारा ने हिन्दी साहित्य को दिया है। ‘रामचन्द्रिका’ केशवदास कृत है, इसे भी महाकाव्य माना जाता है। इस काव्यधारा की बहुत सी रचनाएँ मुक्तक भी है, जैसे ‘विनयपत्रिका’ आदि। कुछ रचनाएँ जैसे ‘कवितावली’ ऐसी है जो प्रबंध व मुक्तक दोनों के लक्षणों को साथ-साथ धारण करती है।

(ii) काव्य शैली : रामकाव्य में काव्य प्रायः सभी शैलियाँ दृष्टिगोचर होती है। तुलसीदास ने अपने युग की प्रायः सभी काव्य-शैलियों को अपनाया है। वीरगाथाकाल की छप्पय पद्धति, विद्यापति और सूर की गीतिपद्धति, गग आदि भाट कवियों की कवित्त-सवैया पद्धति, जायसी की दोहा पद्धति, सभी का सफलतापूर्वक प्रयोग इनकी रचनाओं में मिलता है। रामायण महानाटक (प्राणचंद चौहान) और हनुमननाटक (हृदयराम) में संवाद पद्धति और केशव की रामचंद्रिका में रीति-पद्धति का अनुसरण है।

(iii)    भाषा : रामकाव्य में मुख्यतः अवधी भाषा प्रयुक्त हुई है। किंतु ब्रजभाषा की इस काव्य का शृंगार बनी है। इन दोनों भाषाओं के प्रवाह में अन्य भाषाओं के भी शब्द आ गए हैं। बुंदेली, भोजपुरी, फारसी तथा अरबी शब्दों के प्रयोग यत्र-तत्र मिलते हैं। रामचरितमानस की अवधी प्रेमकाव्य की अवधी भाषा की अपेक्षा अधिक साहित्यिक है।

(iv)    रस : रामकाव्य में नव रसों का प्रयोग मिलता है। राम का जीवन इतना विस्तृत व विविध है कि उसमें प्रायः सभी रसों की अभिव्यक्ति सहज ही हो जाती है। तुलसी के मानस एवं केशव की रामचंद्रिका में सभी रस देखे जा सकते हैं। रामभक्ति के रसिक संप्रदाय के काव्य में शृंगार रस को प्रमुखता मिली है। मुख्य रस यद्यपि शांत रस ही रहा।

(v)     छंद : राम काव्य की रचना अधिकतर दोहा-चौपाई में हुई है। दोहा चौपाई प्रबंधात्मक काव्यों के लिए उत्कृष्ट छंद है। इसके अतिरिक्त कुण्डलियाँ, छप्पय, कवित्त, सोरठा, तोमर, त्रिभंगी आदि छंदों का प्रयोग हुआ है।

(vi)    अलंकार : रामभक्त कवि विद्वान थे। इन्होंने अलंकारों की उपेक्षा नहीं की। तुलसी के काव्य में अलंकारों का सहज और स्वाभाविक प्रयोग मिलता है। उत्प्रेक्षा, रूपक और उपमा का प्रयोग मानस में अधिक है।

रामभक्ति काव्यधारा के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

(i)   रामानन्द : रामानुजाचार्य की 14वीं या 15वीं शिष्य परंपरा में सुप्रसिद्ध स्वामी रामानन्द हुए। हिन्दी में रामकाव्य के पुरस्करता रामानंद ही माने जाते हैं। रामानंद के गुरु राघवानंद थे। राघवानंद ने उत्तर भारत में रामभक्ति का प्रवर्तन किया परन्तु इसे प्रतिष्ठित और प्रसारित रामानंद ने किया। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने रामानंद को आकाश धर्मा गुरु कहा है, वे कहते हैं- ‘मध्य युग की समग्र स्वाधीन चिन्ता के गुरु रामनंद ही थे।’ रामानंद ने ‘रामावत सम्प्रदाय’ की स्थापना की। इस सम्प्रदाय के लोग ‘वैरागी’ नाम से प्रसिद्ध हुए। इनके रचित प्रमुख ग्रंथ हैं- (1) वैष्णवमाबज भास्कर, (2) श्रीरामार्चन पद्धति, (3) योगचितामणि, (4) रामरक्षास्रोत, (5) आनन्दभाष्य आदि। रामानंद के 12 शिष्य थे- अनन्तानन्द, सुखानन्द, सुरसुरानन्द, नरहर्यानन्द, भावानन्द, पीपा, कबीरदास, सेन, धन्ना, रैदास, पद्मावती, सुरसुरी। रामानन्द रचित प्रमुख काव्य पंक्ति-

(1)     आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।

          जाके बल भर ते महि काँपै । रोग सोग जाकी सीमा न चांपै।।

(2)     कहाँ जाइए हो धरि लागो रंग। मेरो चंचल मन भयो अपंग ।।

(ii)  तुलसीदास : गोस्वामी तुलसीदास का रचनाकाल 16वीं शताब्दी स्वीकारा जाता है। तुलसीदास रामानुजाचार्य के ‘श्री सम्प्रदाय’ और विशिष्टाद्वैतवाद से प्रभावित थे। इनकी भक्ति भावना ‘दास्य भाव’ की थी। तुलसी के गुरु नरहर्यानन्द थे। आचार्य शुक्ल तुलसीदास को ‘स्मार्त वैष्णव’ मानते हैं उनके अनुसार ‘हिन्दी काव्य की प्रौढ़ता के युग का आरम्भ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा हुआ। हजारीप्रसाद द्विवेदी उनके विषय में कहते हैं- ‘भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।’ गोस्वामी तुलसीकृत 12 ग्रन्थों को प्रमाणिक माना जाता है। इसमें 5 बड़े और 7 छोटे हैं।

(1) वैराग्य संदीपनी, (2) रामाज्ञा प्रश्न, (3) रामललानहछू, (4) जानकी मंगल, (5) रामचरित मानस, (6) पार्वती मंगल, (7) कृष्ण गीतावली, (8) गीतावली, (७) विनय पत्रिका, (10) दोहावली, (11) बरवै रामायण, (12) कवितावली।

तुलसी की पाँच लघु कृतियों- वैराग्य संदिपनी, रामललानहछू, जानकी मंगल, पार्वती मंगल और बरवै रामायण को ‘पंचरत्न’ कहा जाता है।

‘रामचरितमानस’ की रचना संवत 1631 में हुई, इसकी रचना में कुल 2 वर्ष 7 महीना 26 दिन लगे। आचार्य शुक्ल ने ‘रामचरितमानस’ को ‘लोकमंगल की साधानावस्था’ का काव्य माना है। रामचरितमानस में 7 काण्ड या सोपान है, जो क्रमशः इस प्रकार हैं- (1) बालकाण्ड, (2) अयोध्याकाण्ड, (3) अरण्यकाण्ड, (4) किष्किन्धाकाण्ड, (5) सुन्दरकाण्ड, (6) लंकाकाण्ड, (7) उत्तरकाण्ड।

(iii)  स्वामी अग्रदास : रामानंद के शिष्य अनंतानंद और अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी थे, कृष्णदास पयहारी के शिष्य अग्रदास जी थे जो लगभग 1556 ई. में वर्तमान थे। अग्रदास ने रामभक्ति परम्रा में ‘रसिक सम्प्रदाय’ की स्थापना की। इनकी चार पुस्तक का पता चलता है- हितोपदेश अपखाणाँ बावनी, ध्यानमंजरी, रामध्यानमंजरी और अ ष्टयाम या रामअष्टयाम । अग्रदास जी का काव्य ब्रज भाषा में है जिसमें प्रवाह के साथ-साथ परिष्कार भी है। सुंदरपद-रचना और अलंकारों के प्रयोग से यह प्रमाणिक होता है कि इन्हें शास्त्रीय साहित्य का अच्छा ज्ञान था।

          अग्रदास कह धन्य सो, जाहि दियो गुरु ज्ञान।
          सो तन लिन्हों सुफल के, छूटा दुःख महान।।

(iv)  नाभादास : लाभादास गोस्वामी तुलसी के समकालीन रामभक्त कवि थे। इनका जन्म अनुमानतः 1570 ई. के आस-पास हुआ था। नाभादास के गुरु स्वामी अग्रदास थे। डॉ. ग्रियर्सन ने नाभादास का आसपास ब्रजभाषा में ‘भकबतमाल’ की रचना की। ‘भक्तमाल’ में 200 कवियों का जीववृत्त और उनकी भक्ति की महिमासूचक बातों को 316 छप्पयों में लिखा गया है।

सन 1712 ई. में प्रियदास ने ‘भक्तमाल’ की टिका ‘रसबोधिनी’ शीर्षक से ब्रजभाषा के कवित्त सवैया शैली में लिखी। नाभादास ने रामचरित से सम्बन्धित दो अष्टयामों की भी रचना की जो संस्कृत के चम्पूकाव्य शैली में रचित है। उन्होंने ‘अष्टयाम’ की रचना शृंगार भक्ति अथवा रसिक भावना लेकर की है। अष्टयाम में नाभादास ने लिखा है-

          अवधपुरी को शोभा जैसी। कहि नहीं सकहि शेष श्रुति तैसी।।

(v)   केशवदास (1555-1617) : केशवदास का उपनाम वेदान्ती मिश्र था और ये निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित थे। यद्यपि केशव की साहित्य में प्रमुख भूमिका रीतिकाल के अन्तर्गत है परन्तु ‘रामचन्द्रिका’ के आधार पर केशव रामभक्ति शाखा के कवि ठहरते हैं। कुछ विद्वान इन्हें रीतिकाल का प्रवर्तक के रूप में मानते हैं। आचार्य शुक्ल केशव को अलंकारवादी मानते हैं। शुक्ल जी इनकी कटु आलोचना करते हुए इन्हें कठिन काव्य का प्रेत भी कहते हैं। केशवदास की प्रमुख रचनाएँ हैं- रसिक प्रिया, रामचन्द्रिका, कविप्रिया, रतन बावनी और छंदमाल।

रामस्वरूप चतुर्वेदी ने इनकी ‘रामचन्द्रिका’ को छन्दों का अजायबहार कहा है।

इसके अतिरिक्त अन्य रामभक्त कवियों में- हृदयराम, प्राणचंद चौहान, विष्णुदास तथा सेनापति आदि नाम आते हैं।

परवर्ती राम काव्य-परम्परा : तुलसीदास ने राम-भक्ति काव्य को इतना उत्कर्ष प्रदान किया कि आगे के कवियों के लिए नवीन सर्जनात्मक सम्भावनाएँ लगभग समाप्त हो गई। यह भी सच है कि तुलसी के पश्चात राम भक्त कवि अधिक नहीं हुए। तुलसीदास तथा परवर्ती भक्त कवियों के पश्चात राम-काव्य का सृजन करने वाले कवियों में केशवदास का नाम उल्लेखनीय है। फिर केशव का काल तो भक्तिकाल है, पर प्रवृत्तियाँ रीतिकालीन है।

रीतिकाल में राधा-कृष्ण के सुमिरन के बहाने शृंगार को अतिशय महत्त्व मिला। राम का लोकसंग्रही रूप रीतिकालीन कवियों की मनोवृत्ति के अनुकूल नहीं पड़ सका। यही कारण है कि इस काल में बहुत कम रचनाएँ राम को लेकर लिखी गई है।

आधुनिक काल में नवजागरण की चेतना से प्रेरणा पाकर अनेक रचनाकार रामकाव्य के सृजन कर्म में प्रवृत्त हुए हैं। भारतेन्दु, रामचरित उपाध्याय, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, बलदेव प्रसाद मिश्र आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। आधुनिक साहित्य ककी रामकाव्य परम्परा में सर्वाधिक महत्त्व मैथिलीशरण गुप्त के महाकाव्य ‘साकेत’ और खण्ड काव्य ‘पंचवटी’ को मिला है। साकेत पर वैष्णव चिन्तन और गाँधी-विचार दर्शन की गहरी छाप है। ‘साकेत’ का कथा विधान नए युग की विचारधाराओं से आन्दोलित है। तुलसी के ‘मानस’ के बाद रामकाव्य परम्परा में ‘साकेत’ और ‘पंचवटी’ का अविस्मरणीय स्थान है।

छायावाद और आधुनिक हिन्दी कविता के सबसे क्रान्तिकारी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ के प्रिय कवि तुलसीदास रहे हैं। निराला जी ने जीवन भर काव्य सृजन किया। सर्वाधिक प्रतिभा का विस्फोट उनकी दो रचनाओं में हुआ– “राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’ हिन्दी प्रदेश का नवजागरण निराला जी की जातीय प्रतिभा में नया अर्थ-संदर्भ पाता है और इस अर्थ सन्दर्भ को सामने लाने का माध्यम है- रामकथा। इस परंपरा में आगे चलकर सुमित्रानन्दन पंत, नरेश मेहता और जगदीश गुप्त के नाम भी उल्लेखनीय हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि रामकाव्य–परम्परा आज भी हिन्दी कविता में नए रूपों और रंगों को लेकर निरन्तरता और परिवर्तन के साथ दिखाई देती है।

सारांश : हिन्दी में रामभक्ति काव्य परम्परा लोक और शास्त्र दोनों के सामंजस्य से अपना पथ-प्रशस्त किया है। ऊपर से उनकी रचना स्वान्तः सुखाय, आत्म निवेदनात्मक, आत्म प्रबोध के लिए दिखाई देती है, लेकिन गहराई में हम पाते हैं कि लोक-धर्म, लोक-चिन्ता, लोक-मंगल ही इस रचना कर्म की प्रेरणा भूमि है। रचना में उपदेश है तो राम कथा के अन्तर्गत ही है। रामभक्त कवि की ओर से उसे आरोपित नहीं किया गया है। कवि का तो एक ही उपदेश है हरि पद में अनुराग, नवधा भक्ति में डूबकर तन्मयता की प्राप्ति, नैतिक-मूल्य भावना से सुधार–परिष्कार–विस्तार। भारत के राममय होने का कारण भी यही है कि संत कवि तुलसी ने परम्परा के अमृत तत्त्व को उसमें भर दिया। ऐसी भावना के कारण राम-कथा अन्याय पर न्याय की जीत की कथा है।

सगुण : कृष्ण भक्ति काव्यधारा

भक्तिकालीन सगुण भक्ति के आराध्य देवताओं में श्री कृष्ण का स्थान सर्वोपरि है। कृष्ण भारतीय पुराण और इतिहास दोनों में सर्वाधिक वर्णित है। कृष्ण से संबंधित महत्त्वपूर्ण ग्रंथ में महाभारत एवं गीता, पुराण ग्रंथ आते हैं। पुराणों के पश्चात् संस्कृत काव्यों में कृष्ण लीलाओं का अश्वघोष के ‘ब्रह्मचरित’, जयदेवकृत ‘गीतगोविंद’ में मिलता है। भारतीय भाषाओं में कृष्ण काव्य का प्रारंभ मैथिल कोकिल विद्यापति से स्वीकार किया जाता है। भक्ति काल में कृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार वल्लभाचार्य, निम्बार्क, राधावल्लभ, हरिदास निरंजनी और चैतन्य सम्प्रदाय का योगदान उल्लेखनीय है। इन सब में वल्लभाचार्य के दार्शनिक मत ने हिन्दी के कृष्णभक्ति काव्य को सर्वाधिक प्रेरणा दी। जिस प्रकार स्वामी रामानुज के मत को लेकर रामानंद ने रामभक्ति का प्रचार किया, उसी प्रकार वल्लभाचार्य ने कृष्णभक्ति का प्रचार किया। कृष्ण भक्ति का विकास वल्लभाचार्य के पश्चात् अधिक हुआ।

वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ ने सन् 1568 ई. में चार वल्लभाचार्य और चार अपने शिष्यों को मिलाकर ‘अष्टछाप’ की स्थापना की। कृष्ण भक्ति काव्य मुक्तक गीतिकाव्य है। गीतिकाव्य की जो परंपरा जयदेव और विद्यापति ने चलाई थी, उसी को अष्टछाप के कवियों ने भी अपनाया है। इस शाखा के कवियों ने अपने काव्य में कृष्ण की बाललीला और यौवन लीलाओं को ही स्थान दिया। अतः इनके काव्य में वात्सल्य और शृंगार रस उत्कर्ष की चरमसीमा पर पहुँचा। राधा-कृष्ण के सौंदर्य वर्णन में कवियों ने अपनी प्रतिभा का चरमोत्कर्ष रूप दिखाया। इस शाखा के प्रमुख कवियों में अष्टछाप के कवि सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, गोविंद स्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदाय हैं। इसके अतिरिक्त हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, रसखान, ध्रुवदास, नरोत्तमदास आदि के नाम भी विशेष उल्लेखनीय हैं। कृष्ण भक्त कवियों की एक लंबी श्रृंखला है। इन भक्तों ने अपना सबकुछ श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया।

  • कृष्ण भक्ति काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

(i)  विषय-वस्तु की मौलिकता : हिन्दी साहित्य में कृष्ण काव्य की सृष्टि से पूर्व संस्कृत, प्रकृत तथा अपभ्रंश साहित्य में कृष्ण भक्ति की पर्याप्त रचनाएँ मिलती हैं। यद्यपि इस सारे कृष्ण काव्य का आधार ग्रंथ श्रीमद्भागवद है, परंतु उसे मात्रा भागवत का अनुवाद नहीं कहा जा सकता। कृष्ण चरित्र के वर्णन में इस धारा के कवियों ने मौलिकता का परिचय दिया है। भागवत में कृष्ण के वोकरक्षक रूप पर अधिक बल दिया है, जबकि भक्त कवियों ने उसके लोक रंजक रूप को ही अधिक उभारा है। इसके अतिरिक्त भागवत में राधा का उल्लेख नहीं है, जबकि इस साहित्य में राधा की कल्पना करके प्रणय में अलौकिक भव्यता का संचार हुआ है। विद्यापति और जयदेव का आधार लेते हुए भी इन कवियों के प्रणय-प्रसंग में स्थूलता का सर्वथा अभाव है। अपने युग और परिस्थतियों के अनुसार कई नए प्रसंगों की उद्भावना हुई है।

 (ii)    ब्रह्म के सगुण रूप का मंछन और निर्गुण रूप का खंडन : कृष्ण भक्त कवियों ने ब्रह्म के साकार और सगुण रूप को ही भक्ति का आधार माना है, कृष्ण काव्य के माध्यम से उन्होंने ब्रह्म के निराकार रूप का खंडन कर सगुण की प्रतिष्ठा की है।

          सब विधि अगम विचारहिं, ताते सूर सगुण लीला पद पावै।

(ii)  कृष्ण भक्ति काव्य में लीला का प्राधान्य : कृष्ण भक्ति काव्य में कृष्ण का लीला रूप प्रधान है जो जीवों के सुख के लिए है और जिसमें कृष्ण स्वयं दूहरी-तहरी भूमिका में है। कृष्णलीला में माखन चोरी, वृन्दावनलीला, रास आदि की प्रमुख भूमिका है जहाँ कृष्ण मानुष-रूप में संचरित है। कृष्ण भक्त कवियों ने अपनी कविताओं में राधा-कृष्ण की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाया है। सूरदास ने राधा-कृष्ण के अनेक प्रसंगों का चित्रण कर के उन्हें एक सजीव व्यक्तित्व प्रदान किया है। हिन्दी कवियों ने कृष्ण के चरित्र को नाना रूप प्रदान किये है, जो काफी लीलामयी व मधुर जान पड़ते हैं।

          कंचन मनि मरकत रस ओपी।
          नंद सुवन के संगम सुखकर अधिक विराजति गोपी।।

(iv)   भक्ति भावना : वात्सल्य, सख्य, माधुर्य एवं दास्य भाव की भक्ति का प्राधान्य इस काव्य में मिलता है। वात्सल्य भाव के अंतर्गत कृष्ण की बाल-लीलाओं, चेष्टाओं एवं माँ यशोदा के हृदय की सुंदर झांकी मिलती है। सख्य भाव के अंतर्गत कृष्ण और ग्वालों की जीवन संबंधी सरस लीलाएँ हैं और माधुर्य भाव के अंतर्गत गोपी-लीला प्रमुख है। कृष्ण भक्त कवियों में भक्ति भावना के अंतर्गत सूरदास, कुंभनदास व मीरा का नाम उल्लेखनीय है। सूर के भक्ति काव्य में अलौकिकता और लौकिकता, रागात्मक और बौद्धिकता, माधुर्य और वात्सल्य सब मिलकर एकाकार हो गए हैं।

          नाथ जू अब कै मोहि उबारो।
          पवित में विख्यात पवित हौं पावन नाम विहारो।।

मीराबाई कृष्ण को अपने प्रेमी ही नहीं, अपितु पति के रूप में भी स्मरण करती है। वे मानती हैं कि वे जन्म से ही कृष्ण की प्रेयसी व पत्नी रही हैं। वे प्रिय के प्रति आत्म-निवेदन व उपालंभ के रूप में प्रणय वेदना की अभिव्यक्ति करती है।

भक्ति काव्य के क्षेत्र में मीरा सगुण-निर्गुण श्रद्धा व प्रेम भक्ति व रहस्यवाद के अंतर को भरते हुए, माधुर्य भाव को अपनाती है।

          चित चढ़ी मेरे माधुरी मुरल उर बिच आन पड़ी।
          कब की ठाढ़ी पंछ निहारू अपने भवन खड़ी।।

इन कवियों ने दास्यभाव के विनय पद भी लिखे हैं, किंतु अधिकतर सख्य अथवा कांताभाव को ही अपनाया है।

 (v)  वात्सल्य और शृंगार : कृष्ण भक्ति काव्य के संवेदन, संसार की निश्चित रेखाएँ हैं और गीत काव्य उसका प्रिय माध्यम। वात्सल्य और शृंगार उसकी दो प्रमुख भूमियाँ है और निर्विवाद है कि जहाँ वात्सल्य का प्रश्न है कृष्ण काव्य विश्व की रचनाशीलता में प्रमुख स्थान रखता है। यदि वात्सल्य का नाम लें तो सबसे पहले सूरदास का नाम आता है, जिन्हें इस विषय का विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने कृष्ण के बचपन की सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियाँ भी ऐसी चित्रित की है, मानो वे स्वयं वहाँ उपस्थित हों।

सूर का वात्सल्य केवल वर्णन मात्र नहीं है। जिन-जिन स्थानों पर वात्सल्य भाव प्रकट हो सकता था, उन सब घटनाओं को आधार बनाकर काव्य रचना की गयी है।

रामकाव्य में शील-मर्यादा की रेखाएँ शृंगार की सीमाएँ निश्चित कर देती है, पर कृष्ण काव्य अधिक खुली भूमि पर है। यहाँ शृंगार में जो जीवन सम्पृक्ति अथवा लोकपक्ष है, वही उच्चतम धरातल पर भक्ति है। कृष्ण भक्ति काव्य का अध्ययन करने पर हम पाएँगे कि कई स्थल हैं, जिन्हें कवियों ने उन्मुक्त भाव से व्यक्त किया है, अंकुरित भाव से, जिनमें घनिष्ट मिलन चित्र है। भक्ति में शृंगार देह का अतिक्रमण करने की सामर्थ्य रखता है, उच्च स्तर पर आता है। कृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण व गोपियों के प्रेम वर्णन के रूप में पूरी स्वच्छंदता से शृंगार का वर्णन किया है।

(vi)    संगीतात्मकता : कृष्ण काव्य संगीतात्मक है। संगीत की राग-रागिनियों का प्रयोग प्रायः सभी कवियों ने किया है। आज भी संगीत के क्षेत्र में इन पदों का महत्त्व अमिट है। सूर, मीरा, हितहरिवंश, हरिदास आदि कवियों के पदों में संगीत की पूर्व छटा है।

(vii)   प्रकृति चित्रण : भाव प्रधान काव्य होने के कारण इसमें प्रकृति-चित्रण उद्दीपन रूप में अर्थात पृष्ठभूमि रूप में हुआ है। फिर भी प्रकृति के कोमल और कठोर, मनोरम और भयानक दोनों रूपों का समावेश हुआ है। जहाँ संसार का सौंदर्य इनकी आँखों से छूट नहीं सकता है वहीं मानव हृदय के अमूर्त सौंदर्य-चित्रण में कल्पना और भाव का अपूर्व वर्णन हुआ है।

(viii)  भ्रमरगीत-प्रसंग : कृष्ण भक्ति काव्य में भ्रमरगीत प्रसंग का विशेष महत्त्व है, जिसका उल्लेख भागवत में मिलता है और अधिकांश कवियों ने इसका उपयोग किया है। सूरदास ने सूरसागर के दशम स्कंध में विस्तार से इसका वर्णन किया है। नन्ददास ने भंवरगीत नाम से भ्रमरगीत प्रसंग को लेकर स्वतंत्र रचना की। भ्रमरगीत में कृष्ण भक्तकवियों ने गोपिकाओं के प्रगाद प्रेमभाव को व्यक्त किया है और इसे विप्रलंभ शृंगार से उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है। भ्रमरगीत गोपिकाओं के प्रेमभाव की मार्मिक अभिव्यक्ति है। भ्रमरगीत प्रसंग में ऊपर से देखने पर एक पक्षीय प्रेम जैसा प्रतीत होता है पर यहाँ गोपिकाओं की अनन्य भावना के साथ कृष्ण के बृहत्तर दायित्व-बोध का संकेत भी मिलता है। भ्रमरगीत के अंत में कृष्ण गोपिकाओं के प्रेमभाव को स्वीकारते है-

          उधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
          हंस सुता की सुंदर कगरी, अरू कुंजन की छाहीं।
          वे सूरभी वै बच्छ दोहनी, खटिक दुहावन जाहीं।
          बवाल-बाल मिलि करत कुलाहल नाचत गहि गहि बाहीं।

(ix)   सामाजिक पक्ष : यद्यपि भगवान की लीलाओं का ही चित्रण अधिक हुआ है, लेकिन इसके साथ-साथ लोक-मंगल की भावना भी स्वतः समाविष्ट हो गई। उद्धव-गोपी संवाद में उद्धव को लक्षित करके अलखवादी, स्वाभिमानी निष्फल कायाकष्ट को ही सर्वश्रेष्ठ साधन मानने वाले योगियों को अच्छी खबर ली है। उपदेशात्मकता का अभाव है। संपूर्ण काव्य सरस और रमणीय है।

  • शिल्प विधान

(i)    काव्य रूप : कृष्ण भक्ति काव्यधारा का संपूर्ण साहित्य मुक्तक शैली में ही है। अधिकांश रचना गेय पदों के रूप में हुई है। नंददास के कुछ काव्य जैसे ‘भंवरगीत’ प्रबंधात्मक है, पर यह प्रवृत्ति इस काव्यधारा में काफी कम हैं कुछ कवियों ने सवैया, घनाक्षरी अथवा अन्य छंदों का भी प्रयोग किया है।

(ii)   काव्य शैली : कृष्ण काव्य में गेय शैली का प्रयोग हुआ है। गीतिकाव्य के सभी तत्त्व यथा भावप्रणता, आत्मभिव्यक्ति, संगीतात्मक, संक्षिप्तता, भाषा की कोमलता आदि मिलते हैं। गीतिकाव्य की लंबी परंपरा में कृष्णभक्तिकाव्य को लीला पदों की सुविधा है, जहाँ माधुर्य भाव की प्रधानता की सहायता से भाव-संचार हो सका है।

(iii) भाषा : भक्तिकाव्य के सफल निर्वाह के लिए जिस संवेदन सम्पन्न, मधुर, लयात्मक भाषा की अपेक्षा होती है, उसके लिए ब्रजभाषा समर्थ है और कृष्ण भक्तकवियों ने उसका सक्षम उपयोग किया। यहाँ भाषा का वह रूप है जो लोकप्रचलित है और जिसे कवियों ने काव्योपयोगी बनाया। कृष्ण भक्तिकाव्य ब्रज संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि कृष्ण के व्यक्तित्व का मुख्यांश उससे संबद्ध है और जिन्हें कृष्ण भक्ति के अष्टछापी कवि कहा जाता है वे इससे जुड़े हुए हैं। कृष्ण भक्त कवियों ने भाषा के मुहावरे को मुख्य रूप से जीवन संसक्ति से प्राप्त किया है, पर ब्रज का परिवेश इस कार्य में उनकी सहायता करता है। कृष्ण भक्ति काव्य में अत्यंत ललित और प्रांजल ब्रजभाषा के दर्शन होते हैं, भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से कृष्ण काव्य सम्पन्न है।

(iv) छंद : यहाँ गीति-पद, चौपाई, सार और सरसी। दोहा, कवित्त, सवैया, छप्पय, गीतिका, हरिगीतिका आदि छों का प्रयोग मिलता है। पदों का प्रयोग इस काव्यधारा की एक विशिष्ट पहचान है। इन कवियों द्वारा अधिकांश छंद ऐसे अपनाए गए हैं जो कीर्तन की पद्धति में सहायक हो। मीरा ने अपने गीति काव्य में दोहा और रोला का भी प्रयोग किया है। कुल मिलाकर कृष्ण भक्ति परंपरा गेय छंदों को आधार बनाकर विकसित होती रही है।

(v)  अलंकार : कृष्ण भक्त कवियों का अलंकार विधान चमत्कारों के लिए न होकर हृदय के भावों को व्यक्त करने के लिए किया गया है। सभी कवियों ने अलंकारों का प्रयोग विशेष रूप से सौंदर्यबोध के लिए किया। उदाहरणार्थ यदि हम सूरदास को ही देखते हैं तो वे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, वक्रोक्ति, रूपकातिश्योक्ति, मलोपमा आदि अलंकारों का खुले मन से प्रयोग करते हैं। संग रूपकों के लिए सूरदास प्रसिद्ध हैं। जैसे-

          अब हौं नाच्यों बहुत गोपाल
          काम क्रोध को पहरि चोलना कंठ विषय की माल
          महामोह के नूपुर बाजत निंदा सबद रसाल ।।

हिन्दी के कृष्ण भक्त कवियों में नए से नए उपमानों की कमी नहीं है। इसलिए इनका अलंकार विधान सजीव सार्थक और मनोहारी है।

(vi)  प्रतीक और बिंब : ब्रजभाषा ने काव्य भाषा के रूप में अपनी शक्तियों के विकास के लिए अनुभूति को मूर्त रूप में प्रस्तुत करने के लिए बिंबों और प्रतिकों का कलात्मक ढंग से विकास किया। एक प्रकार से यह प्रतिकों से भरी हुई भाषा है। नाम प्रतिक, स्थान प्रतिक, दार्शनिक, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रतिक, उत्सव पूजा से संबंधित प्रतिक और मिथिकल प्रतिकात्मक कथाएँ इस काव्य में भरी पड़ी हैं। कृष्ण पूर्णावतार ब्रह्म के प्रतिक हैं तो राधा अह्लादिनी शक्ति और श्री शोभा की प्रतिक। गोपियों की अभिव्यंजना शक्ति का संपूर्ण विकास उनके बिंब विधान में प्रकट होता है। प्रकृति के उपमानों और स्थितियों को लेकर बिंब विधान का पूरा संसार खड़ा किया गया है। सूरदास एक ही कड़ी में बिंबों की लड़ी बाँध देते हैं, इसे बिंब माला की कविता भी कहा जा सकता है। दृश्य और ध्वनि बिंब के संश्लिष्ट रूप से यहाँ आते रहते हैं

          शोभित कर नवनीत लिए
          घुटुरन चलत रेणु मंडित सुख दधि लेप किए।
          लट लटकन मन मत्त मधुपगन माधुरी अधिक पिए।

लय के संगीतपरक बिंब इस काव्य की एक अतिरिक्त शक्ति है। यह शक्ति नरोत्रमदास, रसखान और मीरा में साफ दिखाई देती है।

कृष्ण भक्ति काव्यधारा के प्रमुख कवि

(i)   कुंभनदास : कुंभनदास प्रथम अष्टछापी कवि थे। इन्होंने 1492 ई. में वल्लभाचार्य से दीक्षा ग्रहण की। ब्रजभाषा में इनके अनेक फुटकल दोहे प्राप्त होते हैं। इनकी पद रचना में संगीत और लय का सौंदर्य अधिक देखने को मिलता है। कुंभनदास अकबर के निमन्त्रण पर पैदल ही फतेहपुर सीकरी गए जिस पर अफसोस करके लिखते हैं-

          संतन को कहा सीकरी सों काम
          आवत जात पन्हैया टूटी बिखरी गयो हरिनाम ।

(ii)  सूरदास : सूरदास कृष्ण भक्ति शाखा के शिखर भक्त कवि हैं। इनकी तीन रचनाएँ प्रसिद्ध हैं- सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी। ‘सूरसागर’ की कथा भागवत पुराण के दशम स्कन्ध से ली गई है। इसमें कृष्ण जन्म से लेकर कृष्ण के मथुरा जाने तक की कथा फुटकर पदों में कही गयी है। ‘साहित्य लहरी’ में सूरदास के दृष्टकूट पद संकलित हैं। सूरदास ब्रजभाषा के पहले सशक्त कवि है, किन्तु इनकी रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यपूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की शृंगार और वात्सल्य संबंधी उक्तियाँ सूरदास की झूठी-सी जान पड़ती है। आचार्य शुक्ल ने इसीलिए कहा है कि “सूरसागर किसी चली आती हुई गीतकाव्य परम्परा का (चाहे वो मौखिक ही रही हो) पूर्ण विकास-सा प्रतीत होता है। सूरदास रचित ‘सूरसागर’ का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश ‘भ्रमरगीत’ है। सूरदास के काव्य में भक्ति का मूल भाव प्रेम बताया गया है। सूर के काव्य में प्रेम की विराट परिकल्पना है। सूरदास वात्सल्य और शृंगार रस के कवि सम्राट है। शृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में जहाँ तक सूर की दृष्टि पहुँची है वहाँ तक और किसी कवि की नहीं। कुछ चित्र दृष्टव्य है-

          मैया कबहिं बढ़ेगी चोटी।
          किविक बार मोहिं दूध पियत भई, यह आजहूँ है छोटी।।

(iii)  नंददास : अष्टछाप के कवियों में नंददास का स्थान काव्य सौष्ठव और भाषा की प्रांजला में सूरदास के बाद है। इनके प्रमुख ग्रंथ है- रसमंजरी, रूपमंजरी, सुदामा चरित, रासपंचाध्यायी और भंवरगीत। इनमें सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रासपंचाध्यायी’ है जो रोला छंदों में लिखी गई है। इसमें जैसा की नाम से ही प्रकट है, कृष्ण की रासलीला का अनुप्रासादियुक्त साहित्यिक भाषा में विस्तार के साथ वर्णन है। हिन्दी के समस्त भ्रमरगीतों में नंददास का भँवरगीत’ दार्शनिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है। इनके काव्य के विषय में यह उक्ति प्रसिद्ध है: “और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया” इससे प्रकट होता है कि इनके काव्य का कलापक्ष महत्त्वपूर्ण है। इनकी रचना बढ़ी सरस और महत्त्वपूर्ण है।

(iv) परमानंददास : इन्हें संगीत का विशेष ज्ञान था। अष्टछाप कवियों में काव्य सौष्ठव की दृष्टि से सूरदास और नंददास के बाद इन्हीं का स्थान है। इन्होंने अपनी रचनाएँ ब्रजभाषा में लिखी है। परमानन्ददास की रचनाओं, ‘परमानन्दसागर’ प्रमुख है जिसमें 635 पद है। इसके अतिरिक्त ‘दानलीला’ तथा ‘ध्रुवचरित’ भी इनकी रचना है। इनके पदों में इनके पदों में कृष्ण के माधुर्य-पक्ष की लीलाओं का गान प्रमुखता से उभर कर आता है।

          कहा करौ बैकुंठहि जाय ।
          जहाँ नहिं नंद, जहा न जसोदा, नहि अँह गीपी ग्वाल न गाय ।।

(v)   कृष्णदास : कृष्णदास कुनबी जाति के शूद्र होते हुए भी वल्लभाचार्य के कृपा-पात्र थे और श्रीनाथ मंदिर के प्रधान हो गए थे। इन्होंने भी और सब कृष्ण भक्तों के समान राधाकृष्ण के प्रेम को लेकर शृंगर रस के ही पद लिखे हैं। ‘जुगलमान चरित’ नामक इनका एक छोटा सा ग्रंथ मिलता है। इसके अतिरिक्त इनके दो ग्रंथ और कहे जाते हैं- भ्रमरगीत और प्रेमतत्त्व निरूपण। इन्होंने राधाकृष्ण प्रेम-प्रसंग, रूप सौंदर्य आदि का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है।

(vi)  गोविन्द स्वामी : गोविन्द स्वामी ब्रजमण्डल के महावन नामक स्थान पर रहते थे, वे जहाँ रहते थे वह स्थान ‘गोविंद स्वामी की कादमखंडी’ नाम से प्रसिद्ध है। अकबर के नवरत्नों में तानसेन गोविन्द स्वामी से संगीत गायन की शिक्षा ग्रहण करते थे। इन्होंने कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं लिखा, इनके द्वारा रचित 600 पद बताये जाते हैं। इनके रचनाओं का संकलन ‘गोविंद स्वामी के पद’ नाम से संकलित है।

(vii) छीतस्वामी : इनके पदों में शृंगार के अतिरिक्त ब्रजभूमि के प्रति प्रेमव्यंजना भी अच्छी पाई जाती है। इन्होंने जो स्फुट पद रचना की वही ‘पदावली’ नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें लगभग 200 पर संकलित हैं। इनकी कविता साधारण कोटि की है। 

          हे विधना तोसो अँचरा पसरि माँगौ, जनम जनम दीजो याही ब्रज बसिबो।। 

(viii) चतुर्भुजदास : चतुर्भुजदास प्रसिद्ध अष्टछाप कवि कुंभनदास के कनिष्ठ पुत्र थे और विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे। ये भी अष्टछाप कवियों में है। इनकी भाषा चलती और सुव्यवस्थित है। इनके सफुट पदों का संकलन ‘चतुर्भुज कीर्तन संग्रह’, ‘कीर्तनावली’ और ‘दानलीला’ नाम से प्रकाशित है। 

(ix) मीराबाई : मीराबाई सगुण भक्ति काव्यधारा की श्रेष्ठ कवयित्री हैं। मीरा को असमय ही वैधव्य का दुःख झेलना पड़ा था। यहीं से उनका मन कृष्ण भक्ति की ओर उन्मुक्त होता है। मीराबाई रचना स्फुट पद ही प्राप्त है जो वर्तमान में ‘मीराबाई की पदावली’ के नाम से प्रकाशित और उपलब्ध है। उनके काव्य में राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है। उसमें गुजराती का भी पुट मिलता है। 

          मीराबाई की भक्ति माधुर्य और कांता भाव की है। वे अपने आराध्य को प्रियतम के रूप में स्वीकार करती है। इस भाव की भक्ति में रहस्य का समावेश अनिवार्य है जिसे आचार्य शुक्ल सूफियों का प्रभाव मानते हैं। मीरा के यहाँ वेदना की व्यापकता है विरह वेदना उनका यथार्थ है तो कृष्ण से मिलन उनका स्वप्न । मीरा के जीवन का यथार्थ है 

                    अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम बेल बोई। 

और मीरा का स्वप्न है- 

                  सावन माँ उमग्यो म्हारो हियरा भणक सुण्या हरि आंवण री। 

(x)  रसखान : कृष्ण भक्ति शाखा के मुसलमान कवियों में रसखान का नाम विशेष आदर से लिया जाता है। रसखान की 42 रचनाएँ मिलती हैं प्रेमवाटिका, सुजान रसखान, दान लीला और अष्टयाम । प्रेमवाटिका में कवि ने राधा-कृष्ण को मानिन-माली मानकर प्रेमोद्यान का वर्णन करते हुए प्रेम के गूढ़ तत्त्व का सूक्ष्म निरूपण किया है। इस रचना में 53 दोहे मिलते हैं। रसखान ब्रजभाषा के मर्मज्ञ एवं सशक्त कवि हैं। प्रेम तत्त्व के निरूपण में उन्हें अद्भुद सफलता मिली है। शृंगार एवं वात्सल्य उनके काव्य के प्रमुख रस है। रसखान में भक्त और कवि का अद्भुत समन्वय है और इनकी रचनाओं में ब्रजभाषा कविता का रस सौंदर्य छलक पड़ता है। 

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