विद्यापति की भक्ति भावना (vidyapati ki bhakti bhavna)

प्रश्न: विद्यापति की कविता में व्यक्त भक्ति स्वरूप को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :- आदिकाल में उभरते कवि विद्यापति की कविता में भक्ति तत्व की विद्यमानता बहस का विषय रही है। आ. शुक्ल उनकी आध्यात्मिकता पर कटाक्ष करते है तो वहीं बच्चन सिंह उनकी भक्ति की तुलना खुजराहों के मंदिरों की आध्यात्मिकता से करते है। (vidyapati ki bhakti bhavna)
स्थूल से सूक्ष्मता की ओर जाने पर विद्यापति के काव्य में भक्ति तत्व दिखाई पड़ते है जिसकी पुष्टि आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी विद्यापति को भक्त कवि मानकर करते है। दूसरी ओर जॉर्ज ग्रियर्सन भी विद्यापति को रहस्यवादी कवि मानते है।
विद्यापति के काव्य में भक्ति की पुष्टि : (vidyapati ki bhakti bhavna)
- विद्यापति के गीतों का आप्प श्री मंदिरों में गाया जाना। यहाँ तक कि चैतन्य महाप्रभु इनके गीतों को गाते गाते मूर्छित हो जाया करते थे।
- गोविन्ददास और कृष्णदास जैसे भक्त इन्हें भक्त कवि बताते है।
- श्यामसुंदर दास कहते है कि विद्यापति के काव्य में अनेक पद ऐसे है कि जिनमें राधाकृष्ण के सात्विक चित्रण मिलते है।
- जॉर्ज गिर्यसन ने अपनी पुस्तक मैथिल कैस्थोसफी में सथा को जीता विद्यापति के राधा को जीकात्मा का प्रतीक बताया है तो वहीं कृष्ण को परमात्मा स्वरूप ।
- भक्तिकाल का संपूर्ण कृष्ण काव्य का लोकरंजककारी स्वरूप यदि भक्ति काव्य का हिस्सा है तो विद्यापति को भी सूरदास की श्रेणी में लिया जा सकता है।
- विद्यापति की सना पदावली तीन भागों में विभक्त है – ईश वंदना; राधा कृष्ण प्रेम, अन्य।
निस्संदेह विद्यापति के यहाँ भक्ति का रूप विद्यमान है परन्तु ईश्वरविषयक रति और रति में व्याप्त सूक्ष्म अंतर अनायास ही अतिष्याप्त होने लगते है। संदेह का एक कारण विद्यापति का शैव भक्त होना भी है। इसलिए भक्ति और श्रृंगारिकता में एक ओर होना न्यायसंगत नहीं। विद्यापति में भक्ति और श्रृंगार का समन्वित रूप दिखाई पड़ता है, कहीं उनका श्रृंगार रस प्रखर है तो कहीं भवित प्रभावी।
(vidyapati ki bhakti bhavna)