हिंदी साहित्य की ओर एक कदम।

रैदास के पद, पद संख्या: 1, 4, 19

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(1)

बिनु देखै उपजै नहीं आसा, जो दीसै सो होइ बिनासा।
बरन सहित जो जापै नामु, सो जोगी केवल निहकामु॥
परचै रामु रवै जउ कोई, पारसु परसै दुविधा न होई॥1॥ रहाउ॥
सो मुनि मनकी दुविधा खाइ, बिनु दुआरे त्रैलोक समाइ।
मनका सुभाउ सभु कोई करै, करता होइ सु अनभै रहै ॥2॥
फल कारन फूली बनराई, फल लागा तब फूलू बिलाई।
गिआनै कारन करम अभिआसु, गिआन भइआ तब करमह नासु ॥3॥
प्रित कारन दधिमथै सइआन, जीवत मुकत सदा निरबान।
कह रैदास परम बैराग, रिदै रामु कीन जपिसि अभाग ॥4॥

(4)

ऐसे कछु अनुभौ कहत न आवै। साहिब मिलै तउ को बिलगावै॥टेक॥
सब में हरि है हरि में सब है, हरि अपनो जिन जाना।
साखी नहीं और कोई दूसर, जाननहार सयाना॥1॥
बाजीगर सो राचि रहा, बाजी का मरम न जाना।
बाजी झूठ सांच बाजीगर, जाना मन पतियाना॥2॥
मन थिर होइ त कोइ न सूझै, जानै जाननहारा।
कह रैदास बिमल विवेक सुख, सहज सरूप संभारा ॥3॥

(19)

दरसन दिजै राम, दरसन दीजै।
दरसन दीजै विलंब न कीजै ॥टेक॥
दरसन तोर जीवन मोरा। बिन दरसन क्यों जिवै चकोरा ॥1॥
साधो सतगुरु सब जग चेला। अबके बिछुरे मिलन दुहेला॥2॥
धन जोबन की झूठी आसा। सत सत भाषै जन रैदासा ॥3॥

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