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रस निष्पत्ति

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भारतीय काव्यशास्त्र में रस निष्पत्ति’ का विषय सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा का केंद्र रहा है। रस का अर्थ है ‘आनंद’ और निष्पत्ति का अर्थ है ‘सिद्धि’ या ‘प्रकटीकरण’। काव्य को पढ़ने या नाटक को देखने से जिस अनिर्वचनीय आनंद की प्राप्ति होती है, उसे रस कहते हैं।

इस सिद्धांत की जड़ें आचार्य भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में हैं, जिसकी व्याख्या बाद के चार प्रमुख आचार्यों ने अपने-अपने ढंग से की है।

1. भरतमुनि का रस-सूत्र (रस निष्पत्ति)

रस निष्पत्ति का आधार भरतमुनि का सुप्रसिद्ध रस-सूत्र है:

“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः”

अर्थात्: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

भरतमुनि ने यह तो बता दिया कि रस कैसे बनता है, लेकिन उन्होंने ‘विभाव’, ‘अनुभाव’, ‘संचारी भाव’ और ‘निष्पत्ति’ शब्दों की स्पष्ट व्याख्या नहीं की। इसी कारण परवर्ती आचार्यों ने इन शब्दों के अर्थ को लेकर चार प्रमुख मत प्रस्तुत किए।

2. रस निष्पत्ति के चार प्रमुख व्याख्याकार

रस निष्पत्ति की प्रक्रिया को समझने के लिए हमें इन चार आचार्यों के सिद्धांतों को समझना होगा:

(i) भट्ट लोल्लट: उत्पत्तिवाद (Utpattivada) (रस निष्पत्ति)

भारतीय काव्यशास्त्र में रस-सूत्र के प्रथम व्याख्याकार भट्ट लोल्लट हैं। उनका सिद्धांत ‘उत्पत्तिवाद’ या ‘उपचयवाद’ के नाम से जाना जाता है। लोल्लट ‘मीमांसा दर्शन’ के अनुयायी थे, इसलिए उन्होंने रस को एक ‘उत्पाद्य’ (उत्पन्न होने वाली) वस्तु माना।

उत्पत्तिवाद के मुख्य बिंदु:

  1. रस की स्थिति: भट्ट लोल्लट के अनुसार, रस मूलतः अनुकार्य (मूल ऐतिहासिक पात्र, जैसे—राम, सीता आदि) में रहता है। अभिनय के समय दर्शक अभिनेता (नट) पर मूल पात्र का आरोप कर लेते हैं, इसलिए इसे ‘आरोपवाद’ भी कहते हैं।
  2. संयोग और निष्पत्ति का अर्थ: लोल्लट ने भरतमुनि के ‘संयोग’ शब्द के तीन अर्थ बताए हैं और उसी आधार पर ‘निष्पत्ति’ (उत्पत्ति) की व्याख्या की है:
    • विभाव के साथ रस का संबंध ‘उत्पाद्य-उत्पादक’ है (विभाव रस को उत्पन्न करते हैं)।
    • अनुभाव के साथ संबंध ‘गम्य-गमक’ है (अनुभाव रस की प्रतीति कराते हैं)।
    • व्यभिचारी भाव के साथ संबंध ‘पोष्य-पोषक’ है (ये रस को पुष्ट करते हैं)।
  3. नट की भूमिका: अभिनेता अपनी कुशलता और शिक्षा के बल पर मूल पात्र जैसी चेष्टाएँ करता है। दर्शक उन चेष्टाओं को देखकर अभिनेता में ही रस की उपस्थिति मान लेता है।

सिद्धांत की सीमा (दोष):

भट्ट लोल्लट के सिद्धांत का सबसे बड़ा दोष यह है कि उन्होंने दर्शक (सामाजिक) की रसानुभूति की उपेक्षा की है। यदि रस केवल मूल पात्र में उत्पन्न होता है, तो उसे देखने वाले दर्शक को आनंद क्यों प्राप्त होता है? इसी कमी को दूर करने के लिए परवर्ती आचार्यों (शंकुक, भट्ट नायक आदि) ने नए सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।

(ii) श्री शंकुक: अनुमितिवाद (Anumitivada) (रस निष्पत्ति)

आचार्य भट्ट लोल्लट के ‘उत्पत्तिवाद’ की कमियों को दूर करने के लिए आचार्य श्री शंकुक ने रस-सूत्र की दूसरी महत्वपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत की, जिसे ‘अनुमितिवाद’ कहा जाता है। शंकुक ‘न्याय दर्शन’ (तर्कशास्त्र) के अनुयायी थे, इसलिए उनके सिद्धांत में तर्क और अनुमान की प्रधानता है।

अनुमितिवाद के मुख्य बिंदु:

  1. अनुमान का सिद्धांत: शंकुक का मानना है कि रस न तो पात्र में उत्पन्न होता है और न ही अभिनेता में। अभिनेता अपनी कला के माध्यम से मूल पात्र (जैसे राम) का सफल अनुकरण करता है। दर्शक अभिनेता के कुशल अभिनय को देखकर यह अनुमान (Inference) लगा लेता है कि यही राम है और इसी में रस है।
  2. चित्र-तुरग न्याय: इसे समझाने के लिए शंकुक ने प्रसिद्ध ‘चित्र-तुरग न्याय’ (Horse Painting Analogy) दिया। जैसे कागज पर बने घोड़े के चित्र को देखकर हम उसे न तो असली घोड़ा मानते हैं, न ही केवल कागज, बल्कि उसे ‘घोड़ा’ समझकर उसका बोध करते हैं। वैसे ही दर्शक अभिनेता को ‘राम’ समझकर रसास्वाद करता है।
  3. संयोग और निष्पत्ति का अर्थ: * इनके अनुसार संयोग का अर्थ ‘अनुमाप्य-अनुमापक’ संबंध है (विभाव आदि ‘अनुमापक’ हैं और रस ‘अनुमाप्य’ यानी जिसका अनुमान लगाया जाए)।
    • निष्पत्ति का अर्थ यहाँ ‘अनुमिति’ (Inferred knowledge) है।
  4. विलक्षण प्रतीति: दर्शक की यह प्रतीति सामान्य लौकिक ज्ञान से भिन्न होती है। वह अभिनेता को ‘राम’ मानकर एक काल्पनिक सत्य का अनुभव करता है।

सिद्धांत की सीमा (दोष):

शंकुक के मत का सबसे बड़ा दोष यह है कि अनुमान मस्तिष्क या बुद्धि का विषय है, जबकि रस हृदय की अनुभूति है। किसी स्वादिष्ट भोजन का ‘अनुमान’ लगाने से वह आनंद नहीं मिल सकता जो उसे ‘चखने’ से मिलता है। अनुमान से ज्ञान तो बढ़ सकता है, लेकिन वह रसानुभूति जैसी आनंदमयी अवस्था पैदा नहीं कर सकता।

(iii) भट्ट नायक: भुक्तिवाद (Bhuktivada)

आचार्य श्री शंकुक के बाद भट्ट नायक ने रस-सूत्र की तीसरी और सबसे क्रांतिकारी व्याख्या प्रस्तुत की, जिसे ‘भुक्तिवाद’ या ‘भोगवाद’ कहा जाता है। भट्ट नायक ‘सांख्य दर्शन’ के अनुयायी थे। उन्होंने पहली बार रस को ‘पात्र’ या ‘नट’ से निकालकर ‘दर्शक’ के हृदय तक पहुँचाया।

भुक्तिवाद के मुख्य बिंदु:

  1. तीन व्यापार: भट्ट नायक ने काव्य के तीन कार्य (व्यापार) माने हैं:
    • अभिधा: शब्द का सीधा अर्थ बोध कराना।
    • भावकत्व: वह शक्ति जिससे काव्य के पात्र अपनी व्यक्तिगत पहचान छोड़कर ‘सामान्य’ हो जाते हैं। इसे ही ‘साधारणीकरण’ कहा जाता है।
    • भोजकत्व: वह स्थिति जिसमें दर्शक सत्वगुण के उदय के कारण रस का ‘भोग’ (आस्वादन) करता है।
  2. साधारणीकरण का सिद्धांत: यह भट्ट नायक की सबसे बड़ी देन है। इनके अनुसार, साधारणीकरण के माध्यम से शकुंतला केवल दुष्यंत की प्रेमिका न रहकर ‘एक प्रेमिका’ का प्रतीक बन जाती है, जिससे दर्शक उससे जुड़ पाता है।
  3. संयोग और निष्पत्ति का अर्थ: इनके अनुसार संयोग का अर्थ ‘भोज्य-भोजक’ संबंध है और निष्पत्ति का अर्थ ‘भुक्ति’ है।

भट्ट नायक ने यह स्पष्ट किया कि रस न तो उत्पन्न होता है, न अनुमानित, बल्कि उसका भोग किया जाता है। उन्होंने रस को ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ (ईश्वरीय आनंद के समान) मानकर इसे एक उच्च आध्यात्मिक स्तर प्रदान किया।

(iv) अभिनवगुप्त: अभिव्यक्तिवाद (Abhivyaktivada)

भारतीय काव्यशास्त्र में रस-सूत्र के सबसे प्रामाणिक और वैज्ञानिक व्याख्याकार आचार्य अभिनवगुप्त हैं। उनका सिद्धांत ‘अभिव्यक्तिवाद’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो ‘शैव दर्शन’ और ‘ध्वनि सिद्धांत’ पर आधारित है।

अभिव्यक्तिवाद के मुख्य बिंदु:

  1. स्थायी भाव की विद्यमानता: अभिनवगुप्त के अनुसार, रस न तो उत्पन्न होता है और न ही उसका भोग किया जाता है। रस (स्थायी भाव के रूप में) सामाजिक या पाठक के हृदय में ‘संस्कार’ के रूप में पहले से ही सुप्त अवस्था में विद्यमान रहता है।
  2. अभिव्यक्ति की प्रक्रिया: जैसे मिट्टी के सूखे घड़े पर पानी की बूंदें डालने से उसके भीतर छिपी गंध स्वतः प्रकट हो जाती है, वैसे ही काव्य के विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के प्रभाव से हमारे हृदय का सुप्त ‘स्थायी भाव’ रस के रूप में अभिव्यक्त हो जाता है।
  3. संयोग और निष्पत्ति का अर्थ: अभिनवगुप्त के अनुसार संयोग का अर्थ ‘व्यंग्य-व्यंजक’ संबंध है (विभाव ‘व्यंजक’ हैं और रस ‘व्यंग्य’)। यहाँ निष्पत्ति का अर्थ ‘अभिव्यक्ति’ (Manifestation) है।
  4. अलौकिक आनंद: इन्होंने रस को ‘अलौकिक’ माना है। रसानुभूति के समय व्यक्ति अपनी ‘मैं’ की भावना को भूल जाता है और पूर्णतः आनंदमयी चेतना में लीन हो जाता है।

अभिनवगुप्त का यह मत आज भी सर्वमान्य है। इन्होंने सिद्ध किया कि काव्य का आनंद बाहर से नहीं आता, बल्कि वह हमारे अपने ही हृदय की निर्मल और आनंदमयी अवस्था की अभिव्यक्ति है।

रस निष्पत्ति केवल एक मानसिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है। भरतमुनि के सूत्र से शुरू होकर अभिनवगुप्त तक पहुँचते-पूँछते यह स्पष्ट हो गया कि रस पाठक के अपने भीतर का वह आनंद है, जो कला के माध्यम से फूट पड़ता है। आज भी काव्य की कसौटी ‘रस’ ही है, क्योंकि वही पाठक को साधारण से असाधारण की ओर ले जाता है।

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