कार्यालयी पत्र-लेखन

प्रस्तावना
सरकारी कार्यालय की काम को सुचारु रूप से चलने के लिए लिखे जाने वाले पत्रों को ही कार्यालयी पत्र कहा जाता है। इनका प्रयोग किसी सरकारी कार्यालय के प्रशासनिक काम-काज के दौरान किया जाता है। लेकिन वर्तमान समय में विभिन्न गैर-सरकारी संस्थानों और सरकार से अनुदान प्राप्त स्वैच्छिक संस्थानों के कार्यालयों द्वारा किया जाने वाले पत्र- व्यवहार भी कार्यलायी पत्राचार के अंतर्गत स्वीकार किया जाता है। लेकिन इस पाठ में केवल सरकारी काम-काज की प्रक्रिया के दौरान किये जाने वाले पत्र-व्यवहार को ही ‘कार्यालयी पत्र’ के रूप में स्वीकार करते हुए उसकी लेखन प्रविधि के संबंध में विचार किया जा रहा है।
कार्यालयी पत्राचार
कार्यालय संबंधी कार्यों को निपटाने के लिए लिखे जाने वाले पत्र को कार्यालयी पत्र कहा जाता है। सामान्यतः सरकारी, राजकीय एवं प्रशासनिक कामकाज को सुव्यवस्थित एवं सुचारु रूप से चलाने के लिए लिखे जाने वाले पत्रों को ही कार्यालयी – पत्र की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। लेकिन वर्तमान समय में व्यापारिक, व्यावसायिक एवं औद्योगिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों तथा सरकार से अनुदान प्राप्त करने वाले स्वैच्छिक संस्थानों के कार्यालयों और प्रशासनिक विभागों में सरकारी कार्यालयों की तरह काम-काज होने के कारण उनके द्वारा किये जाने वाले पत्र-व्यवहार को भी कार्यलायी पत्राचार के की श्रेणी में रखा जा सकता है। लेकिन सरकारी काम-काज में प्रयुक्त होने वाले पत्रों की एक सुनिश्चित शैली होती है और गैर-सरकारी कार्यालयों का पत्र-व्यवहार किसी सुनिश्चित ढाँचे में बंधा हुआ नहीं होता । इसलिए इस पाठ के अंतर्गतकेवल सरकारी काम-काज की प्रक्रिया के दौरान किये जाने वाले पत्र-व्यवहार को ही ‘कार्यालयी पत्र’ के रूप में स्वीकार करते हए उसकी लेखन प्रविधि के संबंध में विचार किया जा रहा है।
कार्यालयी पत्राचार एवं सामान्य पत्राचार
- औपचारिक – कार्यालयी पत्र पूर्णतया औपचारिक होते हैं जबकि सामान्य जीवन-व्यवहार में किया जाने वाला सामान्य पत्राचार अनौपचारिक होता है।
- निश्चित प्रक्रिया – कार्यालयी पत्राचार की लेखन प्रक्रिया एक सुनिश्चित रूप में बंधी होती है। उसी प्रक्रिया के आधार पर ही कार्यालयी पत्रों को लिखा जाता है लेकिन सामान्य जीवन व्यवहार में किया जाने वाला पत्राचार लेखक के भावों, रुचि एवं प्रवृत्ति के अनुरूप किया जाता है।
- विषय की प्रधानता – कार्यालयी पत्र में ‘विषय’ का महत्त्व अधिक होता है। पत्र लेखक को पत्र के विषय को प्रमुखता प्रदान कर पत्र लिखना चाहिए । पत्र लेखक चाहे कितना ही बड़ा अधिकारी क्यों न हो उसके व्यक्तित्व की छाया पत्र पर नहीं पड़नी चाहिए। सामान्य पत्राचार में लेखक की अपनी भावनाएँ और संवेदनाएँ स्वतः ही दिखाई पड़ती हैं। इसमें लेखक का व्यक्तित्व स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
- तथ्यों की प्रधानता – कार्यालयी पत्र में विषय संबंधी तथ्यों की प्रधानता होती है और तथ्य भी पूर्ण रूप से शुद्ध और स्पष्ट होने चाहियें। इसमें कल्पन या अतिरंजना का समावेश नहीं होता। सामान्य पत्राचार में व्यक्ति अपने मन की बातें कहते हुए कल्पना या अतिरंजना का प्रयोग करने से नहीं हिचकता ।
- निश्चित भाषा-शैली – कार्यालयी पत्राचार की भाषा शैली एक निश्चित रूपरेखा में बंधी होती है। इसमें रूढ़ शब्दों का प्रयोग किया जाता है। उनका आरंभ और अंत तो निश्चित रहता ही है, साथ ही विषय-वस्तु की भाषा भी पूर्णतः निश्चित एवं समान होती है। सामान्य पत्राचार में लेखक स्वछंद रूप से भाषा-शैली का प्रयोग करता है। उसकी अपनी कोई भाषा नहीं होती। लेखक अपनी रुचि एवं विषयानुरूप भाषा में परिवर्तन करता रहता है।
- यथातथ्यता – कार्यालयी पत्राचार में भावुकता का स्थान नहीं होता। अभीष्ट विषय को प्रस्तुत करने के लिए – लेखक को तथ्यों को यथानुरूप रखना होता है। सामान्य पत्राचार में लेखक और पत्र-प्राप्तकर्ता के मध्य अंतरंग संबंधों के कारण भावुकता को विषयानुरूप रखा जाता है।
कार्यालयी पत्रों के लेखन के आवश्यक तत्त्व
कार्यालयी पत्र-लेखन की अपनी एक सुनिश्चित प्रक्रिया होती है। सामान्यतः कार्यालयी पत्र का लेखक प्रतिपाद्य विषय को अपनी प्रतिभा से प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है, फिर भी पत्र-लेखक की निश्चित प्रविधि के कारण उसे भी कुछ सामान्य विशेषताओं/तत्त्वों का ध्यान रखना पड़ता है। कार्यालयी पत्र-लेखन के आवश्यक तत्त्व इस प्रकार हैं-
- परिशुद्धता – कार्यालयी पत्र में तथ्यों की प्रस्तुति का विशेष महत्त्व होता है। ये तथ्य परिशुद्ध रूप से आने चाहिये अर्थात पत्र में मिसिल (फाइल) संख्या, तिथि, क्रमांक, संदर्भ, आँकड़े तथा प्रतिपाद्य विषय संबंधी तथ्य पूर्ण रूप से स्पष्ट एवं याथातथ्य होने चाहिये। इनकी त्रुटि से पत्र में प्रतिपाद्य विषय के यथार्थ का पूर्ण ज्ञान नहीं हो पाता जिससे वास्तविक तथ्य के अभाव में कार्यालय के कार्य में गतिरोध उत्पन्न होता जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि संबंधी अधिकारी पत्र पर हस्ताक्षर करने से पूर्व सम्पूर्ण तथ्यों की जाँच कर ले।
- स्पष्टता – कार्यालय पत्र में कथ्य सामग्री स्पष्ट होनी चाहिए। पत्र की उपयोगिता तभी सार्थक हो सकती है जब उसमें कथ्य सामग्री प्रतिपाद्य विषय को पूर्ण रूप से स्पष्ट कर सके। ऐसा न हो कि पत्र प्राप्तकर्ता को पत्र भेजने वाले से उसके आशय को समझने के पुनः संपर्क करना पड़े।
- विषय – एकान्विति – सामान्यतः कार्यालयी पत्र में एक ही विषय को आधार बनाकर पत्र लिखा जाता है। कार्यालयी पत्र में मूल विषय आरंभ में ही लिख दिया जाता है। शेष पत्र में उसी मूल विषय से संबंधित तथ्यों का उल्लेख होना चाहिए। एक से अधिक विषयों के होने से सभी विषयों से संबंधित बाते सहजता से क्रियान्वित नहीं हो पातीं। यदि एक से अधिक विषयों से संबंधित विभाग का अधिकारी एक ही हो और उस पत्र की सम्पूर्ण जानकारी एक ही फाइल के अंतर्गत आती हो तो कोई समस्या नहीं होती किन्तु यदि उन विषयों पर कार्यवाही कने वाले अधिकारी अलग-अलग विभागों में हों तो सभी विभागों में उस पत्र का एक साथ पहुँच पाना संभव नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त संबंधित अधिकारी के लिय पत्र से अपने विषय के अतिरिक्त अन्य सामग्री व्यर्थ ही होगी। अतः एक पत्र में सामान्य रूप से एक ही विषय होना चाहिए।
- संक्षिप्तता – वर्तमान सामान्य में व्यस्तताओं के कारण संक्षिप्तता कार्यालयी पत्र के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण – तत्व बन गया है। पत्र में अभीष्ट विषय से संबंधित तथ्यों का ही समावेश होना चाहिए। लंबे पत्रों में विषयांतर होने का भय तो बना ही रहता है, साथ ही उन पर अतिशीघ्र कार्यवाही भी नहीं हो पाती। इसलिए आवश्यक है कि पत्र-लेखक को पत्र में सारगर्भित एवं तथ्यपूर्ण सामग्री ही देनी चाहिए।
- स्वतः- पूर्णता – संक्षिप्तता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि पत्र अधूरा हो। कार्यालयी पत्र अपने मंतव्य में पूर्ण स्वत:- होना चाहिए। अभीष्ट विषय के संदर्भ में माँगी गई जानकारी प्रेषित पत्र में पूर्ण रूप से भेजी जानी चाहिए। अपूर्ण जानकारी होने पर प्रेषिती (पत्र प्राप्तकर्ता) स्पष्टीकरण के लिए बार-बार पत्र लिखता रहेगा। संबंधित अधिकारी इस बात का ध्यान भी रखे कि पत्र भेजे जाने से पूर्व उस पर उसके हस्ताक्षर अवश्य हों।
- सहजता-सरलता – कार्यालयी पत्र का मूल उद्देश्य अभीष्ट विषय का पूर्ण ज्ञान प्रेषिती को कराना होता है। – इसलिए पत्र – लेखक को पत्र में लाक्षणिक या आलंकारिक भाषा द्वारा अपनी विद्वता या पांडित्य प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। पत्र की भाषा सहज, सरल और सुबोध होनी चाहिए। कार्यालयी पत्रों की भाषा और शब्दावली प्रायः निर्धारित होती है इसलिए पत्र लेखक को उससे हटकर अपनी विद्वता प्रकट करना उचित नहीं होता।
- शिष्टता – केवल कार्यालयी पत्र ही नहीं वरन सभी प्रकार के पत्रों की भाषा-शैली में शिष्टता एवं शालीनता का गुण अपेक्षित है। कार्यालयी पत्रों की शैली औपचारिक होने के कारण उसमें व्यक्तिगत संबंधों का अभाव होता है इसलिए शिष्ट भाषा-शैली ही पत्र को प्रभावपूर्ण बनती है। शिकायत संबंधी पत्र अथवा किसी भी कार्य की अस्वीकृति देने संबंधी पत्र हों तो भी उन्हें शिष्ट भाषा में ही व्यक्त करना चाहिए ।
- उपयुक्त रूप – कार्यालयी पत्र विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग रूपों में लिखे जाते हैं। लेकिन कार्यालयी पत्र की अपनी एक निश्चित प्रक्रिया भी होती है। इसलिए पत्र लेखक को सतर्क होकर उपयुक्त रूप का ही चयन कर परंपरागत पद्धति का ही अनुसरण करते हुए पत्र लिखना चाहिए।
कार्यालयी पत्राचार के प्रकार
कार्यालयी पत्राचार में विषयों के अनुरूप उनका अपना सुनिश्चित विधान होता है। इसलिए पत्र-लेखन की विधि द्वारा इन्हें सहजता से जाना जा सकता है। भिन्न-भिन्न प्रकार की सरकारी सूचनाओं के कारण सरकारी पत्राचार भी भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। इसके कुछ प्रमुख रूप विशेष स्थान रखते हैं।
- सरकारी (शासकीय) पत्र (Official Letter)
- अर्ध-सरकारी (अर्ध-शासकीय) पत्र (Demi-official leeter/D.O.)
- कार्यालय ज्ञापन ( Office Memorandum)
- ज्ञापन (Memorandum )
- परिपत्र (Circular)
- स्वीकृति पत्र (Sanction Letter)
- कार्यालय आदेश (Office Order)
- अशासनिक पत्र (Un-official letter)
- अनुस्मारक (Reminder)
- अधिसूचना (Notification)
- पृष्ठांकन (Endorsement)
- संकल्प (Resolution)
- प्रेस विज्ञप्ति (Press communique)
- सूचना
- द्रुत-पत्र
- घोषणा
- पावती
- आदेश आदि
निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि किसी भी सरकारी कामकाज को सुचारु रूप से चलाने और विभिन्न सरकारों को समाज के साथ सहजता से संपर्क बनाए रखने के लिए ‘कार्यालयी पत्रों’ का प्रयोग किया जाता है। इसके माध्यम से सरकार के सभी कार्यालयों में आपसी समझ और समन्वय बना रहता है।
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