आदिकालीन प्रवृत्तियाँ एवं डिंगल-पिंगल का भेद (aadikal ki pravritiyan)

प्रश्न- आदिकालीन हिन्दी भाषा की प्रमुख प्रवृत्तियों का परिचय देते हुए डिंगल और पिंगल का अंतर स्पष्ट कीजिए। (aadikal ki pravritiyan)
उत्तर:- आदिकालीन हिन्दी भाषा भिन्न-भिन्न चरणों में विकसित होती रही जो कहीं प्राकृताभास अपभ्रंश में दिखाई पड़ती तो कहीं परिनिष्ठित अपभ्रशं से होती पुरानी हिन्दी के स्वरूप में ढल जाती है।
भाषा का स्वरूप गतिमय होता है। सिङ्घ और नाथों में भाषा जहाँ अपभ्रंश के निकट दिखाई पड़ती है तो विद्यापति स्वयं अपनी रचना कीर्तिलता’ की भाषा अवहट्ठ बताते है। खड़ी बोली की सरसता का प्रभाव अमीर खुसरो की रचनाओं में मिलता है।
प्रमुख प्रवृत्तियाँ :
- संस्कृत में विद्यमान विभक्ति चिह्नों का स्थान आदिकाल में परसर्गो ने ले लिया।
- अधिकांशत शब्दों का अंत स्वरों से होने लगा।
- आदिकालीन हिन्दी भाषा में क्षतिपूरक दीर्घीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही थी।
- संस्कृत और प्राकृत भाषा की संयोगात्मकता कम होते हुए धीरे धीर वियोगात्मकता की ओर बढ़ रही थी जो कि आज हिन्दी के वर्तमान स्वरूप में विद्यमान है।
- भाषा तत्समीकरण के प्रभाव से मुक्त होकर तद्भवीकृत हो रही थी।
- विसर्गों का लोप लगभग हो गया था।
गुरु: – गुरु
डिंगल व पिंगल भाषा में अंतर :
आदिकालीन रासो काव्य में डिंगल और पिंगल दो भाषाओं का स्वरूप सामने आया।
डिंगल :
- तेंसीतरी विद्वान ने डिंगल को गवारू भाषा कहा तो वहीं मोतीलाल मेनारिया ने डिगल शब्द से इसकी उत्पत्ति मानी।
- डिंगल ओघ गुण प्रधान भाषा है।
- डिंगल की व्याकरणिक संरचना अव्यवस्थित है। इसी कारण हरप्रसाद शास्त्री ने इसे अनपढ़ों की भाषा कहा ।
पिंगल :
- डॉ श्यामसुंदरदास ने इसे ब्रज भाषा के समान माना तो वहीं डॉ. रामकुमार वर्मा और डॉ० धर्मवीर ने इसे पूर्णतः ब्रजभाषा माना ।
- पिंगल माधुर्य गुण प्रधान भाषा है।
- डिंगल की अपेक्षा पिंगल भाषा की व्याकरणिक संस्चना निर्णायक है। आचार्य शुक्ल ने भी इसे ब्रज भाषा के आरम्भिक रूप में स्वीकार किया।
- व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो संवत 1050 से 1375 के दौर की भाषा का जो स्वरूप राजस्थानी भाषा के संपर्क में आया वह डिंगल भाषा के रूप में विकसित हुआऔर जो बज क्षेत्र के प्रभाव में आया वह पिंगल भाषा के रूप में। अतः ये दोनों भाषाएँ पृथक न होकर एक ही भाषा से विकसित विभिन्न प्रिन्ज रूप है।
(aadikal ki pravritiyan)